चुनावी मुद्दा : सरकारी विश्वविद्यालय के तलबगार छले गए

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आशुतोष मिश्र/अमृत विचार। शिक्षा, समता और संगठित कारोबार की पहचान वाले शहर के लोग सरकारी विश्वविद्यालय के तलबगार हैं। यह मांग हर बार चुनावी चौपालों से लेकर चुनावों में मुद्दा भी बना। लेकिन, यह मांग पूरी नहीं हो पायी। यहां के हुनरमंद नई पीढ़ी के लिए बेहतर और सस्ती पढ़ाई का मंसूबा पाले उदास हैं। …

आशुतोष मिश्र/अमृत विचार। शिक्षा, समता और संगठित कारोबार की पहचान वाले शहर के लोग सरकारी विश्वविद्यालय के तलबगार हैं। यह मांग हर बार चुनावी चौपालों से लेकर चुनावों में मुद्दा भी बना। लेकिन, यह मांग पूरी नहीं हो पायी। यहां के हुनरमंद नई पीढ़ी के लिए बेहतर और सस्ती पढ़ाई का मंसूबा पाले उदास हैं। इस बार फिर यह मुद्दा उछलेगा जरूर। मगर, यह आस पूरी होगी या फिर उम्मीदों के सपने दिखाए जाएंगे। यह यक्ष प्रश्न है।

मुरादाबाद के तवारीखी पन्नों को देखें तो वृहद स्तर पर शिक्षा की मशाल जलाने वाले सर सैयद अहमद यहां पर विश्वविद्यालय के निर्माण के पक्षधर थे। मुरादाबाद के न्यायाधीश के रूप में उन्होंने यहां सेवा दी। तहसील स्कूल की स्थापना उनके संकल्प की नजीर है। अतीत की यादें संजाने वालों की मानें तो मौजूदा मुस्लिम इंटर कॉलेज का बाहरी रूप अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का भाव देखाता है। दरअसल, यह यहां सरकारी विश्वविद्यालय की सोच उन्होंने यहां सार्वजनिक की थी।

रामपुर के नवाब ने उनके इस संकल्प में सहयोग का आश्वासन भी दिया। तब जिगर कालेज क्षेत्र, पीटीसी और पुलिस अकादमी और आसपास की भूमि की मिल्कियत नवाब के परिवार के पास थी। विश्वस्तरीय पहचान वाले शायर जिगर मुरादाबादी, आजादी के जंग में छापाखाना संचालन करने वाले सूफी अंबा प्रसाद, सेनानी जवाब मज्जू खां, मदरसा शाही के संस्थापक मौलाना हसन मदनी जैसे शिक्षा को लेकर व्यापक सोच रखने वालों के इस शहर के साथ वादाखिलाफ की सिलसिला नया
नहीं है।

दस्तकारों की तरक्की और बहबूदी के लिए काम करने वाले मोहम्मद आजम अंसारी कहते हैं कि नई पीढ़ी के लिए भी अगर राजनीतिक लोग सोचते तो यहां के लोगों का कुछ भला हो जाता। शिक्षा के बेहतर इंतजाम से हम मुरादाबाद की तरक्की का नया दरवाजा खोल सकते हैं। नए दौर में पूर्व क्रिकेटर मोहम्मद अजहरुद्दीन, पीयूष चावला के नाम से मुरादाबाद जुड़ता है। लेकिन, यहां सरकारी स्तर पर उच्च शिक्षा के उपाय नहीं हो पाए।

पूर्व विधायक सैयद राहत मौलाई के बेटे असद मौलाई कहते हैं कि अलीगढ़ विश्वविद्यालय की स्थापना के पहले सर सैयद अहमद मुरादाबाद में शिक्षा के बड़े केंद्र की स्थापना चाहते थे। बिजनौर जनपद के मूल निवासी एएमयू के संस्थापक मुरादाबाद से गहरे जुड़े थे। उनके प्रयासों को यहां लोगों की दकियानूसी सोच से झटका लगा। तब लोग महिलाओं की शिक्षा के प्रति बिल्कुल जागरूक नहीं थे। अंग्रेजी को देश के खिलाफ मानते थे। लोगों की असहमति की वजह से सर सैयद दुखी हो गए, इसलिए यहां बड़े कालेज की स्थापना नहीं हो पाई। बाद में उन्होंने अलीगढ़ को रुख कर लिया। कहते हैं कि हां यह जरूर है कि बाद में कुछ पहल जरूर हुई। उस दौर में मेरे दादा मुंशी सैयद अलीमुद्दीन से दयानंद गुप्ता की गहरी दोस्ती थी। उनके नाम पर ही दयानंद कालेज की स्थापना हुई है। मगर, यहां सरकारी विश्वविद्यालय की मांग को किसी ने अमलीजामा पहनाने का कारगर प्रयास नहीं किया।

शहर विधायक रितेश गुप्ता का कहना है कि हमने इसके लिए प्रयास किया है। प्रशासन की पत्रावलियां इसकी गवाह हैं। मेडिकल कालेज और सरकारी विश्वविद्यालय हमारी प्राथमिकता में है। बिजनौर में मेडिकल कालेज की बुनियाद पड़ चुकी है। मुरादाबाद में विश्व विद्यालय के भू-अधिग्रहण की कार्यवाही काफी आगे बढ़ चुकी है।

सामाजिक कार्यकर्ता सुधाकर रंजन त्यागी कहते हैं कि इस तरह के कार्य दृढ़ संकल्प से पूरे होते हैं। अभी राजकीय उच्च शिक्षा के लिए बरेली की दौड़ मजबूरी है। चुनाव में उछलने वाले मुद्दे पूरे किये जाने की जरूरत है। िशक्षा से ही किसी समृद्ध समाज की कल्पना की जा सकती है। हमारे यहां राजनैतिक पैरवी कमजोर रही है।

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