…तब सड़क पर चुनाव चिन्ह देख प्रभावित होते थे मतदाता

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अविक ठाकुर/अमृत विचार। इतिहास वही होता है जिसे भूले ना भुलाया जा सके। ऐसा ही इतिहास मुरादाबाद की राजनीति का भी रहा है। जो चुनाव में चर्चा का केंद्र बनता है। उस समय में मतदाता सड़क पर बने चुनाव चिन्ह को देखकर ही प्रभावित हो जाते थे, जिसके बाद वह अपना मत प्रत्याशी को दे …

अविक ठाकुर/अमृत विचार। इतिहास वही होता है जिसे भूले ना भुलाया जा सके। ऐसा ही इतिहास मुरादाबाद की राजनीति का भी रहा है। जो चुनाव में चर्चा का केंद्र बनता है। उस समय में मतदाता सड़क पर बने चुनाव चिन्ह को देखकर ही प्रभावित हो जाते थे, जिसके बाद वह अपना मत प्रत्याशी को दे दिया करते थे। इससे प्रत्याशी को मत मिल जाया करते थे और जीत हासिल कर लेते थे।

अमृत विचार से बातचीत में पूर्व विधायक जाहिद हुसैन ने बताया कि 1991 में वह खुद चुनाव लड़े थे। तब एक रात पहले ही प्रत्याशियों को सर्मथन दे दिया जाता था, जिसके बाद अलगी सुबह पर्दानशीं महिलाएं सड़क पर बने चुनाव चिन्ह को देखकर ही अपना मत दे दिया करती थीं। उन्होंने बताया कि 80 के दशक में लोगों के पास कम संसाधन हुआ करते थे। उस दौर में लोगों के घरों में न तो टीवी होते थे और ना ही फोन जैसे सुविधा होती थी। उस दौर में एकमात्र सुविधा होती थी बस ट्रांजिस्टर। जिसे लोग जानकारी रखने व समाचार जानने के लिए सुन लिया करते थे। तकनीकी कमी के कारण कई बार लोग उसे भी नहीं सुन पाते थे। लेकिन इस सुविधा से कोई अछूता रह जाता था तो वो थीं महिलाएं।

यही वजह थी कि महिलाओं को न तो अपने प्रत्याशी और न किसी चुनाव चिन्ह का पता होता था। अगर पता होता था, तो बस बूथ के बाहर चौक व चूने से बना चुनाव चिन्ह। जिस पर वह अपनी मुहर लगा देतीं थी। पार्टी कौन सी है, इससे कोई फर्क नही पड़ता था। अगर फर्क पड़ता था, तो प्रत्याशी से। क्योंकि प्रत्याशी के व्यक्ति को देखकर ही लोग मत दिया करते थे। उस समय पार्टी नहीं बल्कि प्रत्याशी का महत्व होता था। इसी वजह से लोग प्रत्याशी का क्या चुनाव चिन्ह है उसे देखकर प्रभावित हो जाते थे, जिसके बाद अपनी मोहर उस चिन्ह पर लगा दिया करते थे।

जिस ओर हवा, वहीं पड़ता था वोट : 40 साल पहले कांग्रेस, जनसंघ और मुस्लिम लीग जैसी पार्टियां चुनाव लड़ा करती थीं। उस दौर में इन पार्टियों के प्रत्याशियों का प्रभाव हुआ करता था। यही वजह है कि प्रत्याशी अपने व्यक्तित्व से चुनाव लड़ लिया करते थे। लेकिन मुस्लिम और हिन्दू प्रत्याशी जनता को रिझाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते थे। उसके बाद जिस चिन्ह की लहर होती थी, उस पर जनता अपना मत दिया करती थी।

 

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