बुरा दौर
कोरोना महामारी, जलवायु संकट और भू-राजनीतिक तनाव ने हर जगह संघर्ष को जन्म दिया है। दुनिया सबसे बुरे दौर में है। अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने कहा कि दुनिया कई मायनों में पांच साल पहले की तुलना में बदतर है। गुतारेस का कहना इस दृष्टि से सही …
कोरोना महामारी, जलवायु संकट और भू-राजनीतिक तनाव ने हर जगह संघर्ष को जन्म दिया है। दुनिया सबसे बुरे दौर में है। अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने कहा कि दुनिया कई मायनों में पांच साल पहले की तुलना में बदतर है। गुतारेस का कहना इस दृष्टि से सही भी है कि दुनिया में संघर्षों को रोकने, वैश्विक असमानताओं से निपटने, कोरोना संकट व पृथ्वी को गर्म होने से रोकने के लिए कोई बड़े सार्थक प्रयास नहीं किए गए।
दुनिया भर में कोरोना वायरस के व्यापक हमले और मानवता पर छाये अभूतपूर्व संकट को देखते हुए पहली नज़र में जलवायु परिवर्तन या जलवायु नीति पर बात करना भी थोड़ा असामान्य लग सकता है। ग्लोबल वॉर्मिंग के असर के चारों ओर ही जलवायु नीति की बहस तय होती है और इसके खतरों पर विशेषज्ञ हमें लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं। लेकिन कई जानकार अब कह रहे हैं कि बीमारियों का आगमन प्रकृति और मानव के बीच संतुलन बिगड़ने का नतीजा है।
ऐसे में सवाल है कि क्या कोरोना संकट के बाद जलवायु परिवर्तन के लिए अमीर देश गंभीर रह पाएंगे और क्या विकासशील और गरीब देशों के पास इतनी ताकत बचेगी कि वह उत्सर्जन कर रहे देशों पर जलवायु क्रिया के लिए दबाव बना सकें। जाहिर है दुनिया भर में सभी संसाधन इस वक्त कोरोना से लड़ने के लिए लगा दिए गए हैं। फिर भी जलवायु नीति पर इस कठिन समय में बात करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि जलवायु और पर्यावरण की अनदेखी भविष्य में ऐसी और महामारियां ला सकती है। दुनिया में तमाम देशों की जीडीपी पर जैसा असर कोरोना संकट अभी डाल रहा है, वही असर पिछले कम से कम चार दशकों से विकासशील और गरीब देशों पर जलवायु परिवर्तन की वजह से पड़ता रहा है।
एक शोध में दावा किया गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अचानक मौसम में बदलाव से फ्लू की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। जलवायु और पर्यावरण की अनदेखी भविष्य में ऐसी और महामारियां ला सकती है। जैव विविधता, जो कि जलवायु नीति का अहम हिस्सा है- का संबंध इस संकट से है। जब हमारे सामने जीवन-मरण का सवाल मंडरा रहा हो और पूरी अर्थव्यवस्था के चौपट हो जाने का ख़तरा हो तो क्या हमें अभी जलवायु नीति के बारे में सोचना भी चाहिए।
