सादगी की जीती-जागती मिसाल थे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर

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Karpuri Thakur Birth Anniversary: आज कर्पूरी ठाकुर की जयंती है। कर्पूरी ठाकुर दो बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। वह बिहार के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे। हालांकि दुर्भाग्य से वो अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके, लेकिन अपने छोटे से कार्यकाल में उनके द्वारा किए गए कार्यों का असर आज भी बिहार ही नहीं देश …

Karpuri Thakur Birth Anniversary: आज कर्पूरी ठाकुर की जयंती है। कर्पूरी ठाकुर दो बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। वह बिहार के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे। हालांकि दुर्भाग्य से वो अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके, लेकिन अपने छोटे से कार्यकाल में उनके द्वारा किए गए कार्यों का असर आज भी बिहार ही नहीं देश की राजनीति में देखा जाता है। आपको बता दें कि कर्पूरी ठाकुर बिहार में एक बार उपमुख्यमंत्री, दो बार मुख्यमंत्री और दशकों तक विधायक और विरोधी दल के नेता रहे। 1952 की पहली विधानसभा में चुनाव जीतने के बाद वे बिहार विधानसभा का चुनाव कभी नहीं हारे।

कर्पूरी ठाकुर

जब मांग कर पहना फटा कोट
1952 में कर्पूरी ठाकुर पहली बार विधायक बने थे। उन्हीं दिनों उनका आस्ट्रिया जाने वाले एक प्रतिनिधिमंडल में चयन हुआ था। उनके पास कोट नहीं था। तो एक दोस्त से कोट मांगा गया। वह भी फटा हुआ था। खैर, कर्पूरी ठाकुर वही कोट पहनकर चले गए। वहां यूगोस्लाविया के मुखिया मार्शल टीटो ने देखा कि कर्पूरी जी का कोट फटा हुआ है, तो उन्हें नया कोट गिफ़्ट किया गया। आज जब राजनेता अपने महंगे कपड़ों और दिन में कई बार ड्रेस बदलने को लेकर चर्चा में आते रहते हों, ऐसे किस्से अविश्वसनीय ही लग सकते हैं।

कर्पूरी ठाकुर

अलग शख्सियत के नेता थे कर्पूरी ठाकुर
जब करोड़ों रुपयों के घोटाले में आए दिन नेताओं के नाम उछल रहे हों, कर्पूरी जैसे नेता भी हुए, विश्वास ही नहीं होता। उनकी ईमानदारी के कई किस्से आज भी सुनने को मिलते हैं। उनसे जुड़े कुछ लोग बताते हैं कि कर्पूरी ठाकुर जब राज्य के मुख्यमंत्री थे तो उनके रिश्ते में उनके बहनोई उनके पास नौकरी के लिए गए और कहीं सिफारिश से नौकरी लगवाने के लिए कहा। उनकी बात सुनकर कर्पूरी ठाकुर गंभीर हो गए, उसके बाद अपनी जेब से पचास रुपये निकालकर उन्हें दिए और कहा, जाइए, उस्तरा आदि खरीद लीजिए और अपना पुश्तैनी धंधा आरंभ कीजिए।

कर्पूरी ठाकुर

सादगी की आज भी होती है चर्चा
कर्पूरी ठाकुर जितने अपने विचारधारा को लेकर अटल रहते थे उतने ही वो व्यक्तिगत जिंदगी की ईमानदारी का भी पालन करते थे। कई बार विधायक, सांसद मंत्री और दो बार मुख्यमंत्री रहने के बाद भी उनके पास दिल्ली से लेकर पटना और यहां तक की उनके अपने गांव में भी कोई एक अच्छा मकान नहीं था।

युवाओं के साथ कर्पूरी ठाकुर

कर्पूरी ठाकुर ने ओबीसी वर्ग को 26 प्रतिशत आरक्षण दिया
कर्पूरी ठाकुर फार्मूले के अंतर्गत ओबीसी कोटा को विभाजित करके उसे विभिन्न समुदायों में उप-विभाजित किया जाता है। इस फार्मूले को कर्पूरी ठाकुर फर्मूला कहा गया क्योंकि उनके द्वारा ही इसकी शुरुआत की गयी थी। कर्पूरी ठाकुर फर्मूले का सुझाव था कि कोटे को उप-विभाजित किया जाये। जब कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होंने पिछड़े वर्ग को अत्यंत पिछड़े वर्ग, अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) के नाम से विभाजित करके आरक्षण की शुरुआत की थी। मंडल आयोग के गठन से लगभग डेढ़ दशक पहले ही उन्होंने इस फर्मूले के आधार पर ओबीसी वर्ग को बिहार में 26 प्रतिशत आरक्षण देने का काम किया था।

कर्पूरी ठाकुर

कर्पूरी ने स्वतंत्रता आंदोलन में भी लिया था हिस्सा
बिहार के समस्तीपुर के पितौझिया गांव में नाई जाति में जन्मे (कर्पूरी ठाकुर का जन्म 24 जनवरी 1924) कर्पूरी ठाकुर का जीवन काफी संघर्षों से भरा रहा। पटना से 1940 में उन्होंने मैट्रिक परीक्षा पास की और स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े थे। आचार्य नरेंद्र देव के नेतृत्व में उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया था। 1942 के आंदोलन में भी उनकी भूमिका थी साथ ही साथ 1945 में वो जेल भी गए थे। 1952 में पहली बार वो बिहार विधानसभा के लिए चुने गए थे।

 

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