यूपी विधानसभा चुनाव में छोटे दल बढ़ा रहे मुसीबत, ये रही वजह…
लखनऊ। यूपी में विधानसभा चुनाव को लेकर सभी बड़े राजनैतिक दल सक्रिय हो गए है। इसको देखते हुए छोटे और बाहरी दलों ने भी जातीय और क्षेत्रीय समीकरण को साधने की कोशिश कर रहे है। पहले इन्होंने बड़े दलों से गठबंधन करने का प्रयास किया, जब उनकी दाल नहीं गली तो अपने दमखम पर चुनाव …
लखनऊ। यूपी में विधानसभा चुनाव को लेकर सभी बड़े राजनैतिक दल सक्रिय हो गए है। इसको देखते हुए छोटे और बाहरी दलों ने भी जातीय और क्षेत्रीय समीकरण को साधने की कोशिश कर रहे है। पहले इन्होंने बड़े दलों से गठबंधन करने का प्रयास किया, जब उनकी दाल नहीं गली तो अपने दमखम पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। इन दलों की राजनीतिक पकड़ की बात की जाए तो तय जाति व क्षेत्र तक सीमित है। माना जा रहा है कि इससे शायद उनकी मंशा भले न पूरी हो पाए लेकिन बड़े सियासी दिग्गजों का खेल बिगाड़ रहे हैं।
यूपी चुनाव के पहले चरण का पूरा हो चुका है नामांकन
विधानसभा चुनाव को लेकर पहले चरण का नामांकन पूरा हो चुका है। दूसरा चरण का 31 जनवरी को पूरा होना है और तीसरे चरण का शुरू होने वाला है। इस बीच सियासी दलों में दलबदल काफी तेजी से चल रहा है। इस बीच छोटे दल भी प्रदेश की धरती पर पैर जमाने के लिए लगातार प्रयासरत है। इसमें दूसरे राज्यों के कुछ दल भी गठबंधन के लिए बड़े दलों की ओर टकटकी लगाए देख रहे है लेकिन माना जा रहा है कि अब कोई बड़ी पार्टी इन दलों के साथ गठबंधन नहीं करेगा।
जितना गठबंधन होना लगभग हो चुका है। इन दलों में असदुद्दीन औवेसी, चन्द्रशेखर आजाद और आम आदमी जैसी पार्टियों को अपने साथ किसी बड़े दल की दरकार थी लेकिन उनकी मंशाओं पर पानी फिर गया, जिस पर अब वे अकेले मैदान में उतर आए है। हालांकि उन्होंने बाबूलाल कुशवाहा के साथ चुनाव लड़ने घोषणा कर दी है।
बाहरी दल बने चुनौती
सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी जहां दो दलों अपना दल और निषाद पार्टी को मिलाकार चुनावी रण में उतर रही है। वहीं, सपा ने जनशक्ति पार्टी (सोशलिस्ट), महान दल, रालोद, प्रसपा और सुभासपा समेत कुछ अन्य दलों का साथ मिलने के बाद अब किसी अन्य दल को साथ लेने की संभावनाओं पर पानी फेर दिया है।
इधर, हैदराबाद की असुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम, आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद, बिहार में भाजपा के सहयोगी जनता दल यूनाइटेड और विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) पहले गठबंधन करना चाह रहे थे लेकिन बाद में उन्हें हरी झंडी न मिलने पर स्वयं अकेले मैदान में उतारने का ऐलान कर दिया है। ये दल जातीय और क्षेत्रीय समीकरण के आधार पर प्रत्याशी उतारकर दूसरे दलों का समीकरण बिगाड़ रहे है।
ओवैसी को मिला भाजपा की बी पार्टी का तमगा
बिहार, पश्चिम बंगाल के बाद औवेसी अब उत्तर प्रदेश में अपना दमखम दिखाने को बेकरार है। मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में औवेसी की पार्टी को अपने अनुकूल माहौल देखने को मिल रहा है हालांकि आम जनता से लेकर सियासी हल्कों में उनकी पार्टी को गैर भाजपा को नुकसान पहुंचाकर उनकी सहायता करने का आरोप लगता है।
वे अपनी सभाओं में भाजपा या योगी सरकार से ज्यादा सपा को ही टारगेट कर रहे है। प्रदेश में अपने पांव जमाने की गरज से औवेसी काफी पहले ही सुभासपा के मुखिया ओमप्रकाश राजभर के भागीदारी संकल्प मोर्चा में शामिल होकर चुनाव लड़ने की बात कही थी लेकिन राजभर के सपा में साथ जाने के बाद से उनका यह प्लान पूरी तरह से फेल हो गया।
ओवैसी, सपा के लिए हानिकारक
अखिलेश के औवेसी के साथ न जाने की एक बड़ी वजह 2017 के चुनाव में औवेसी की पार्टी एआईएमआईएम ने जितनी सीटों पर भी चुनाव लड़ा था सब पर उसकी जमानत जब्त हो गयी थी। बिहार में पांच सीटे मिलने के बाद आत्मविश्वास से लबरेज औवेसी कुछ चिल्लर पार्टियों के साथ 100 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कह रहे है।
राजनीतिक जानकारों की माने तो यदि औवेसी प्रदेश में दमखम दिखाने की जिद पर अड़े रहे तो इसका सीधा नुकसान गैर भाजपा दलों जिनमें सपा कांग्रेस और बसपा शामिल है को होगा। इनमें सबसे ज्यादा नुकसान सपा को होगा, इस संभावना से राजनीतिक विश्लेषकों को इससे इनकार नहीं है।
प्रदेश में इस समय 19 फीसदी मुस्लिम है इस वोट बैंक पर सपा-बसपा और कांग्रेस तीनों ही अपना दावा ठोकती है लेकिन हकीकत में देखा जाए तो इस वोट बैंक पर समाजवादी पार्टी का ही खासा प्रभाव है इसलिए सबसे ज्यादा डर सपा को औवेसी का ही सता रहा है।
बसपा का खेल बिगाड़ने में लगे चंद्रशेखर
औवेसी की तरह आजाद समाज पार्टी के मुखिया चन्द्रशेखर आजाद जिनका दलित वोटबैंक के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर भी खासा प्रभाव है। वे पहले काफी इच्छुक है उन्हें बसपा साथ मिल जाए। इस बावत वे कई बार कह भी चुके है कि उन्हें मायावती का आर्शीवाद मिल जाए तो वे उनके साथ जाना चाहेगे लेकिन उन्होंने साफ कर दिया है कि वे किसी से तालमेल नहीं करेगी बल्कि अपने दम पर अकेले चुनाव लड़ेंगी।
दरअसल 2019 का लोकसभा चुनाव सपा के साथ मिलकर लड़ी थी लेकिन इस चुनाव के बाद दोनों के रास्ते अलग हो गए। इसके बाद सपा अध्यक्ष की ओर हाथ बढ़ाया तो बात नहीं बनने पर अकेले चुनाव मैदान में ताल ठोकने उतर आए। इसी आम आदमी पार्टी सांसद संजय सिंह गठबंधन को लेकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव से कई बार मिले लेकिन तालमेल नहीं हो पाया।
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