बरेली: दरगाहों की सियासत से दूर क्या है मुस्लिम महिलाओं की तैयारी

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बरेली, अमृत विचार। शहर की बात करें तो मुस्लिम राजनीति में लगभग हर चुनाव के दौरान दरगाहों की सियासत का बोलबाला रहता है। हर चुनाव में खानकाहों और दरगाहों से आने वाली आवाजों के आधार पर एक बड़ा मुस्लिम तबका अपना वोट तय करता है, लेकिन दरगाहों की सियासत से दूर मुस्लिम महिलाओं की राजनीति …

बरेली, अमृत विचार। शहर की बात करें तो मुस्लिम राजनीति में लगभग हर चुनाव के दौरान दरगाहों की सियासत का बोलबाला रहता है। हर चुनाव में खानकाहों और दरगाहों से आने वाली आवाजों के आधार पर एक बड़ा मुस्लिम तबका अपना वोट तय करता है, लेकिन दरगाहों की सियासत से दूर मुस्लिम महिलाओं की राजनीति में दखल और दिलचस्पी दोनों बढ़ी हैं। एक जमाना था, जब घर-परिवार और शौहर के अनुसार महिलाएं वोट देती थीं, लेकिन बदलते वक्त के साथ तमाम ज्वलंत मुद्दों पर मुस्लिम महिलाएं मुखर रहने लगी हैं। फिर चाहें वो तीन तलाक का मसला हो या फिर बेटियों की तालीम पर बात हो रही हो।

तीन तलाक कानून के जरिए भारतीय जनता पार्टी ने मुस्लिम महिलाओं की एक बड़ी आबादी को अपने पाले में करने की कोशिश की, मगर अब भी काफी महिलाएं ऐसी हैं जो तीन तलाक को गलत तो मानती हैं, लेकिन इससे उनके वोट देने की निर्णय पर कोई फर्क नहीं पड़ता। घर संभालने से लेकर समाज सेवा से जुड़े काम करने वाली ज्यादातर मुस्लिम महिलाओं का मानना है कि उनकी बेटियों को इस वक्त सबसे अधिक तालीम की आवश्यकता है। मौका मिले तो मुस्लिम महिलाएं और उनकी बेटियां हर क्षेत्र में अपना दम दिखाने को तैयार हैं और दिखा भी रही हैं।

इसके लिए सरकारों को मुस्लिम लड़कियों के लिए छात्रवृत्ति जैसी योजनाओं को सरल बनाने की जरूरत है। वहीं, अधिकतर मुस्लिम महिलाओं के लिए किफायती रसोई सबसे बड़ा मसला है। बाकी महिलाओं की तरह मुस्लिम महिलाएं भी चुनाव में महंगाई के मुद्दे को अपना प्रमुख मसला मानती हैं। मौजूदा वक्त में जिस तरह महंगाई ने उन्हें परेशान किया है, उस लिहाज से जो भी सरकार बने, उसकी प्राथमिकता में रसोई का बजट जरूर होना चाहिए।

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