मुफ्त उपहारों पर सवाल

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
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चुनाव में राजनैतिक दल अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए लोकलुभावन घोषणाओं का सहारा लेते हैं। जबकि अव्यावहारिक वादों का बोझ अखिरकार जनता को ही उठाना पड़ता है। उच्चतम न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राजनीतिक दलों के चुनावों के दौरान कथित तौर पर अव्यावहारिक लोकलुभावन वादे करने के मामले में …

चुनाव में राजनैतिक दल अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए लोकलुभावन घोषणाओं का सहारा लेते हैं। जबकि अव्यावहारिक वादों का बोझ अखिरकार जनता को ही उठाना पड़ता है। उच्चतम न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राजनीतिक दलों के चुनावों के दौरान कथित तौर पर अव्यावहारिक लोकलुभावन वादे करने के मामले में केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया।

याचिकाकर्ता ने सार्वजनिक निधि से तर्कहीन मुफ्त उपहार का वादा करने वाले दलों के विरुद्ध कदम उठाने की अपील की है। याचिका में कथित तर्कहीन वादों को ‘रिश्वत’ और ‘अनुचित’ रूप से प्रभावित करने के समान माना है। देश में चुनावी घोषणा पत्र में वादे करके मुफ्त समान बांटने या कहें कि कर्ज माफी की राजनीति वर्तमान में चरम पर है।

आजादी के बाद सबसे पहले मुफ्त उपहार संस्कृति को तमिलनाडु की एक क्षेत्रीय पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने शुरू किया था, डीएमके ने चुनाव जीतने के लिए 1996 में बीपीएल कार्ड धारकों को मुफ्त में रंगीन टेलीविजन देने का वादा किया। उसका यह फार्मूला काम कर गया और वह चुनाव भी जीत गई और करुणानिधि मुख्यमंत्री भी बन गए। इससे तमिलनाडु के साथ ही अन्य राजनीतिक दलों को चुनाव जीतने का मानो एक नया मंत्र ही मिल गया।

लगभग सभी राजनीतिक दल वोट के बदले लोगों को कुछ न कुछ देने का वादा करने लगे हैं। ऐसा नहीं है कि चुनावी वादे पहले नहीं हुआ करते थे, पहले भी हुआ करते थे लेकिन पहले के वादे में सड़क बनवाने, पुल बनवाने, नहर खुदवाने और कारखाने लगवाने के साथ ही स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सार्वजनिक ढांचे को मजबूत करने की बात की जाती थी लेकिन आज वोटर को तुरंत लाभ देने का वादा किया जाता है। लगता है अब मतदाता और राजनीतिक दलों के बीच याचक और दाता का संबंध बनता जा रहा है।

राजनीतिक दलों से जुड़े लोग यदि वास्तव में लोकहितकारी काम करें तो उन्हें इस तरह की पैंतरेबाजी की जरुरत ही न पड़े। फिर राजनीतिक दलों के वादे करते समय कोई नहीं पूछता कि यह बातें व्यावहारिक हैं भी या नहीं और यह वादे पांच साल में पूरे हो भी सकते हैं या नहीं? इस सबके लिए मतदाता को राजनीतिक तौर पर शिक्षित व जागरूक करने की जरुरत है। चुनाव आयोग को भी निष्पक्षता बनाए रखने के लिए परखना जरूर चाहिए कि किए जा रहे वादों की गंभीरता कितनी है।