यूपी चुनाव 2022: इस बार मुस्लिम समुदाय नहीं चाहता है मतों का बिखराव, यह रही वजह…

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लखनऊ। प्रदेश में विधानसभा चुनाव की वैतरणी पार करने के लिए सभी दल अपने-अपने दांवपेंच आजमा रहे है। जातियों के गुणागणित के साथ ही धर्मों के वोट बैंकों पर भी सभी दलों की नजरें गड़ी हुई हैं। मौजूदा चुनाव में सपा गठबंधन, बसपा और कांग्रेस की नजर प्रदेश में मौजूद 20 प्रतिशत मुस्लिम वोट बैंक …

लखनऊ। प्रदेश में विधानसभा चुनाव की वैतरणी पार करने के लिए सभी दल अपने-अपने दांवपेंच आजमा रहे है। जातियों के गुणागणित के साथ ही धर्मों के वोट बैंकों पर भी सभी दलों की नजरें गड़ी हुई हैं। मौजूदा चुनाव में सपा गठबंधन, बसपा और कांग्रेस की नजर प्रदेश में मौजूद 20 प्रतिशत मुस्लिम वोट बैंक को अपने पाले में करने की है तो मुस्लिम मतदाता भी इस बार अपने वोट को लेकर सजग है।

वह इस बार अलग-अलग पार्टियों में बंट कर अपनी ताकत को कमजोर नहीं करना चाहता हैं। अब उनकी यह सजगता कितनी कारगर होती है यह तो चुनाव नतीजे ही बतायेंगे लेकिन फिलहाल तो कई राजनीतिक दल इस वोट बैंक को प्रभावित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।

अपनी ताकत वापस पाने की जुगत लगा रहे मुस्लिम मतदाता

दरअसल, वर्ष 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में सबसे कम सिर्फ 24 मुस्लिम विधायक जीते थे। मुस्लिम विधायकों की यह हिस्सेदारी छह प्रतिशत से भी कम है, जबकि प्रदेश में मुसलमानों की आबादी 20 फीसदी है। आबादी के मुताबिक विधानसभा में प्रतिनिधित्व नहीं होने के कारण मुसलमानों का मानना है कि उनकी राजनीतिक ताकत में कमी आई है और वह इसको वापस पाने के लिए पूरी ताकत लगाने और एकजुट होने को तैयार दिख रहे है।

मुस्लिमों के अनुसार, उन्हें माना जाता है दोयम दर्जे का नागरिक

ऐसे में यह भी समझना जरूरी है कि आखिर मुसलमान मतदाता क्या चाहता है? मुस्लिम आबादी का सबसे बड़ा मुद्दा आजादी के बाद से आज तक चला आ रहा है। उनका मानना है कि उन्हे दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता है। इसके अलावा अन्य मुद्दे जैसे शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य भी हैं।

ऐसे में हिंदुत्व का झंडा बुलंद करने वाली भाजपा सरकार आने से मुस्लिम मतदाता असहज महसूस कर रहा है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव से भाजपा ने अब तक चली आ रही राजनीति की धुरी को ही पलट कर रख दिया। पहले राजनीति की जो धुरी मुस्लिम मतदाता के इर्द-गिर्द घूमती थी अब भाजपा सरकार में उसकी वह राजनीतिक ताकत या साख लगातार कम होती जा रही है।

ये है मुस्लिम मतों की ताकत

प्रदेश की कुल 403 विधानसभा सीटों में से करीब 143 पर मुस्लिम मतदाताओं का असर हैं। इनमे से करीब 35 सीटों पर मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका निभाता है तो शेष सीटों पर राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करने की क्षमता रखता हैं। यही चुनावी गणित भाजपा छोड़ सभी दलों को मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारने के लिये प्रेरित करता हैं।

अभी तक मुस्लिम मतदाता हर विधानसभा सीट के मुताबिक मतदान करता था और जो भी प्रत्याशी भाजपा के खिलाफ मजबूत दिखता था उसे ही वोट दे देता था, चाहे वह किसी भी दल का हो लेकिन इसमे कई बार भ्रम की स्थिति हो जाती थी और मुस्लिम मतों में बिखराव हो जाता था। जिससे भाजपा जीत जाती थी। इसीलिये इन सीटों में भी कुछ पर भाजपा जीत दर्ज करा लेती थी।

जातियों के हिसाब से मुस्लिमों का रूझान

हिंदू मतदाता की तरह मुस्लिम मतदाता भी पूरी तरह से नही ंतो एक हद तक जातियों में बंटा हुआ है। इसमे ऊंची जाति के मुस्लिमों खान, शेख पठान, सिद्दीकी और सईद का रूझान सपा और कांग्रेस की ओर तो अंसारी, मंसूरी जैसे पसमांदा मुस्लिमों का रूझान बसपा की ओर, जबकि शिया मुस्लिम का एक वर्ग भाजपा की ओर रहता है।

जिलों में मुस्लिमों की मौजूदगी

प्रदेश के विभिन्न जिलों में मुस्लिम वोटों के मौजूदगी देखे तो मुरादाबाद में 50.80 प्रतिशत, रामपुर में 50.57 प्रतिशत, बिजनौर में 43.04 प्रतिशत, सहारनपुर में 41.97 प्रतिशत, शामली में 41.73 प्रतिशत, मुजफ्फरनगर में 41.11 प्रतिशत, अमरोहा में 40.78 प्रतिशत, बलरामपुर में 37.51 प्रतिशत, मेरठ में 34.43 प्रतिशत, बरेली में 34.54 प्रतिशत, बहराइच में 33.53 प्रतिशत, हापुड़ में 32.39 प्रतिशत, संभल में 32.88 प्रतिशत, श्रावस्ती में 30.79 प्रतिशत, सिद्धार्थनगर में 29.23 प्रतिशत, बागपत में 27.98 प्रतिशत, अलीगढ़ में 19.85 प्रतिशत, लखीमपुर खीरी में 20.08 प्रतिशत, अमेठी में 20.06 प्रतिशत गोंडा में 19.76 प्रतिशत लखनऊ में 21.46 प्रतिशत मुऊ में 19.46 फीसदी महाराजगंज में 17.46 प्रतिशत पीलीभीत में 24.11 फीसदी संत कबीर नगर में 23.58 प्रतिशत सीतापुर में 19.93 फीसदी वाराणसी में 14.88 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की है। इसके अलावा अन्य जिलों में यह आबादी 10 से 15 प्रतिशत के बीच है।

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