बरेली: वोटर के पैर छूने व गले लगाने का फोटो फेसबुक पर पोस्ट कर प्रचार

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बरेली,अमृत विचार। नेता जब गरीब लोगों को गले लगाने लगे तो समझिए चुनाव आ गया है। कुछ इसी तरह का नजारा इन दिनों फेसबुक पर दिखाई दे रहा है। गांव में उपले थापती महिला से हालचाल लेती और उसे गले लगाती तस्वीर लेकर उसे फेसबुक पर पोस्ट किया जा रहा है। यही सपा प्रत्याशियों का …

बरेली,अमृत विचार। नेता जब गरीब लोगों को गले लगाने लगे तो समझिए चुनाव आ गया है। कुछ इसी तरह का नजारा इन दिनों फेसबुक पर दिखाई दे रहा है। गांव में उपले थापती महिला से हालचाल लेती और उसे गले लगाती तस्वीर लेकर उसे फेसबुक पर पोस्ट किया जा रहा है। यही सपा प्रत्याशियों का डिजिटल प्रचार है।

शहर में विभिन्न मोहल्लों में अलग अलग समुदाय की बैठक प्रत्याशी कर रहे हैं। वहां लोगों का समर्थन भी उन्हें मिल रहा है। अब यह समर्थन वोट में बदलेगा नहीं यह तो रिजल्ट बताएगा लेकिन गले में माला पहनें प्रत्याशी जनता के प्यार से अभिभूत हो रहे हैं।

उनके समर्थक मोबाइल से फोटो लेना नहीं भूलते और फिर इस फोटो को फेसबुक पर पोस्ट कर दिया जा रहा है। किसी समर्थक के फेसबुक फ्रेंड की संख्या कम है तो इसका जुगाड़ उन्होंने उस पोस्ट को अपने फ्रेंड को टैग कर रहे हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचकर अपनी बात कह सकें।

चुनाव लड़ रहे सपा प्रत्याशियों के ट्विटर पर फालोअर कम हैं या न के बराबर हैं। गांव में टि्वटर का इस्तेमाल भी कम होता है इसलिए प्रत्याशी इधर कम ध्यान दे रहे हैं। सभी का जोर फेसबुक पर ज्यादा है।

गांव में घरों के अंदर हो रही बैठकों में लोगों के हुजूम से घिरे सपा प्रत्याशी न तो खुद कोराना गाइडलाइन का पालन कर पा रहे हैं और न ही अपने वोटरों को सामाजिक दूरी बनाने की बात कह पा रहे हैं। इससे गांव में चल रही बैठकों में कोराना गाइडलाइन का तो पालन ही नहीं हो पा रहा है।

जनता भी नेताओं का चरित्र जान चुकी हैं। जनता कह रही है कि नेता आ रहे हैं तो मजबूरी में उनकी हां में हां करनी पड़ती है। जीतने के बाद तो यही नेता जनता से मिलते नहीं है। कोरोना काल में नेता जी के पास राशन कार्ड बनवाने गए, तो वह राशन कार्ड तक नहीं बनवा पाए अब दरवाजे पर वोट मांगने आ रहे हैं।

समर्थकों में अभी उत्साह नहीं
चुनाव प्रचार को लेकर समर्थकों में उत्साह नहीं जगा है। सपा कार्यकर्ता बताते हैं इस बार चुनाव में अभी तक मजा नहीं आ रहा। प्रचार है नहीं, झंडा बैनर भी नहीं है। नामांकन कराने के बाद प्रत्याशियों के कार्यालय में खाने पीने की व्यवस्था होती थी, चिंता नहीं रहती थी। इस बार तो घर से खाना खाकर आना पड़ रहा है।

प्रत्याशी के घर बैठना पड़ रहा है। प्रचार की रणनीति नहीं है। फोन से संपर्क नहीं हो पाता है। कब कहां जाते हैं इसकी वास्तविक जानकारी नहीं रहती है। चुनिंदा पदाधिकारी साथ रहते हैं वे जहां कहते हैं वहां बैठकें और सभाएं हो जा रही हैं। समर्थकों का कहना है कि प्रत्याशी फोन करके घर बुलाते हैं कि कुछ बात करनी है।

समर्थक उत्साहित होकर घर पहुंचता है तो देखता है कि प्रत्याशी को यह देखने का वक्त नहीं है कि कौन समर्थक आया है और वे किस व्यक्ति से बात करने में व्यस्त हैं। कई कार्यकर्ता ऐसे भी हैं जो कह रहे हैं कि अभी प्रत्याशियों को समर्थकों की जरूरत नहीं है। सम्मान से समझौता नहीं करेंगे। जब जरूरत हो तो बुलाएं। प्रत्याशी तो अपने को जीता समझ रहे हैं। उन्हें कार्यकर्ताओं की जरूरत नहीं है।

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