नए अवसरों का समय
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को भाजपा की ओर से आम बजट पर आयोजित कार्यक्रम में कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जैसे पूरी दुनिया बदल गई थी, उसी प्रकार कोरोना महामारी के बाद भी दुनिया में बहुत सारे बदलाव की संभावना है और एक नई विश्व व्यवस्था तैयार होगी। कोरोना का यह कालखंड …
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को भाजपा की ओर से आम बजट पर आयोजित कार्यक्रम में कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जैसे पूरी दुनिया बदल गई थी, उसी प्रकार कोरोना महामारी के बाद भी दुनिया में बहुत सारे बदलाव की संभावना है और एक नई विश्व व्यवस्था तैयार होगी।
कोरोना का यह कालखंड पूरी दुनिया के लिए एक प्रकार से क्रांतिकारी परिवर्तन है। आगे की दुनिया वैसी नहीं होगी जैसी कोरोना काल से पहले थी। प्रधानमंत्री ने नए वर्ल्ड ऑर्डर की संभावना जताई है। सही है कि कोविड-19 ने जिस तरह दुनिया को हिलाकर रख दिया, उससे उम्मीद की जा रही है कि नई विश्व व्यवस्था का समय अवश्य आ गया है।
जिस तरह महामारी के चलते मौजूदा विश्व व्यवस्था की कमियां उजागर हुईं, उससे उम्मीद की जा रही है कि नई विश्व व्यवस्था का समय अवश्य आ गया है। संयुक्त राष्ट्र संघ व विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की कमजोरियों के बारे में चर्चाएं लगातार हो रही हैं।
उधर भारत अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के जरिए महामारी से उभरती चुनौतियों से निपटने में अब तक सफल रहा है। भारत ने चीन और अमेरिका के बीच एक अच्छा संतुलन रखा है। भारत की अर्थव्यवस्था का निरंतर विस्तार हो रहा है। आज बहुत से देश भारत की ओर देख रहे हैं कि कैसे इस महामारी पर काबू पाता है।
प्रधानमंत्री मोदी का कहना सही है कि यह समय भारत के लिए नए सिरे से तैयारी का, नए अवसरों का और नए संकल्पों की सिद्धि का है।
दरअसल द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद स्थापित उदारवादी विश्व व्यवस्था का बिखराव एक तरह से 2001 में 9/11 के आतंकी हमले के बाद से ही शुरू हो गया था।
2008 के आर्थिक संकट के आते-आते अमेरिकी नेतृत्व कमजोर होता गया और इसके समानांतर चीन अपनी दस्तक वैश्विक पटल पर जमाता चला गया। अब देखना होगा कि कोरोना बाद की विश्व व्यवस्था का स्वरूप क्या होगा? प्रश्न यह भी है कि नया मार्ग निकालने में कौन आगे आता है? भारत के पास मौका है।
दुनिया के कई देश आज भारत की तरफ देख रहे हैं। ऐसे देशों में अफ्रीकी, दक्षिण-पूर्व एशिया, लैटिन अमेरिका के देश शामिल हैं। इन्हीं देशों में विश्व के साढ़े तीन अरब लोग निवास करते हैं। इन देशों की परिस्थितियां अमेरिका, चीन और अन्य यूरोपीय देशों की परिस्थितियां से बिलकुल अलग हैं।
इन परिस्थितियों में यदि भारत नेतृत्व का बीड़ा उठाना चाहे तो यह सबसे अच्छा मौका है। वैसे भी यह यह विचार व्यवस्थाओं की लड़ाई है, जिसके बारे में नए विश्व को नए ढंग से सोचना पड़ेगा और यह निर्धारित करना पड़ेगा कि इस नई विश्व व्यवस्था में किस तरफ हम जाना चाहते हैं।
