तीन फरवरी 1954 का कुंभ मेला: भगदड़ की वजह से चली गई थीं सैकड़ों लोगों की जान
वर्ष 1947 में भारत आजाद हुआ था और आजादी के कुछ ही साल बाद यानी साल 1954 में संगम नगरी इलाहाबाद जो अब प्रयागराज के नाम से जाना जाता है के गंगा किनारे कुंभ मेले का आयोजन किया गया। यह मेला आज ही कि दिन यानि 3 फरवरी 1954 यानी मौनी अमावस्या के दिन पड़ा …
वर्ष 1947 में भारत आजाद हुआ था और आजादी के कुछ ही साल बाद यानी साल 1954 में संगम नगरी इलाहाबाद जो अब प्रयागराज के नाम से जाना जाता है के गंगा किनारे कुंभ मेले का आयोजन किया गया। यह मेला आज ही कि दिन यानि 3 फरवरी 1954 यानी मौनी अमावस्या के दिन पड़ा था। इस मिले कुछ ऐसा हुआ कि ये मेला हमेशा के लिए यादगार बन गया।
इतिहास के पन्नों में जानें के बाद पता चलता है कि 3 फरवरी 1954 को प्रयागराज के कुंभ में एक बड़ा ही दर्दनाक हादसा हुआ था जिसमें करीब सैकड़ों लागों की जान चली गई थी। दरसअल इसी दिन कुंभ मेले में भगदड़ मच गई और इस भगदड़ में करीब 500 लोगों ने अपनी जानगांवा दी। जिसकी वजह से ये दर्दनाक घटना हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई।
जानिए उस दिन क्या हुआ था?
जानकारी के मुताबिक 3 फरवरी 1954 को मौनी अमावस्या थी और इसी दिन शाही स्नान भी था। लेकिन सुबह 10 बजे के आसपास मेला परिसर में व्यवस्था बिगड़ गई और लोग इधर-उधर भागने लगे। इससे कई लोग भीड़ में दब गए हैं और भगदड़ इतनी खतरनाक थी कि जो व्यक्ति एक बार गिर गया, उसे उठने का मौका तक नहीं मिला। वो दबा रहा और इसी तरह से सैंकड़ों लोगों की कुचलने से या दम घुटने से मौत हो गई। अभी तक मरने वालों का आंकड़ा साफ नहीं है, क्योंकि अलग अलग रिपोर्ट में मरने वाले लोगों की संख्या पर दावा किया जाता है। वैसे अनुमान है कि वहां 500 से 700 लोगों की मौत हो गई थी।
भगदड़ के बताए जाते हैं कई कारण
1954 कुंभ में मची भगदड़ के कई कारण बताए जाते हैं। यहां तक इस भगदड़ मचने के कारण पर सियासत भी काफी होती रही है। दरअसल, इस भगदड़ से पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का नाम जुड़ा है। उस वक्त नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे और वो कुंभ की तैयारियों का जायजा लेने वाले खुद वहां पहुंचे थे। कई पत्रकारों और रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि नेहरू ने उसी दिन वहां का दौरा किया था और उनके वीआईपी मूमेंट की वजह से भीड़ को रोक लिया गया था। जब भीड़ काफी ज्यादा बढ़ गई तो भगदड़ मच गई और कई लोगों की जान चली गई।
ऐसे में कई लोग नेहरू को कुंभ में मची भगदड़ का जिम्मेदार मानते हैं। यहां तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी एक चुनावी सभा में ये दावा कर चुके हैं। हालांकि, बीबीसी समेत कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि नेहरू उस दिन कुंभ मेले में नहीं गए थे, जिस दिन वहां भगदड़ मची थी। वो एक दिन पहले कुंभ मेले में गए थे, जहां उन्होंने कुंभ की तैयारियों का जायजा लिया था। जबकि उस वक्त के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद संगम क्षेत्र में ही थे और सुबह के वक़्त किले के बुर्ज पर बैठकर दशनामी संन्यासियों का जुलूस देख रहे थे। साथ ही कई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि एक हाथी की वजह से भगदड़ मच गई थी।
इसके बाद ही नेहरू ने अपील की थी कि जिस दिन भी शाही स्नान हो, उस दिन नेताओं को कुंभ नहीं जाना चाहिए। साथ ही इसके बाद से कुंभ के आयोजन में व्यवस्था को लेकर काफी ध्यान रखा जाता है। इसके बाद भी कई बार भगदड़ की घटना हुई है, लेकिन 1954 हमेशा याद रखा जाएगा।
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