कभी पैसे बचाने के लिए स्टेशन से स्टूडियो तक का रास्ता पैदल तय करती थीं सुर साम्राज्ञी लता

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मुंबई। अपने मधुर गीतों से करोड़ों दिलों पर राज करने वाली सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर के जीवन में एक वह दौर वह भी था जब उनके पास पैसे बहुत कम हुआ करते। पैसे बचाने के लिए वह स्टेशन से स्टूडियो का रास्ता पैदलत तय करती थीं। लताजी काफी समय पहले एक टीवी चैनल पर जावेद …

मुंबई। अपने मधुर गीतों से करोड़ों दिलों पर राज करने वाली सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर के जीवन में एक वह दौर वह भी था जब उनके पास पैसे बहुत कम हुआ करते। पैसे बचाने के लिए वह स्टेशन से स्टूडियो का रास्ता पैदलत तय करती थीं। लताजी काफी समय पहले एक टीवी चैनल पर जावेद अख्तर के साथ बातचीत में कहा था,‘‘उस समय मेरे पास पैसे बहुत थोड़े हुआ करते थे। स्टेशन से स्टूडिया की ओर लोग तांगे से जाते थे। मैं पैदल जाया करती थी। पैसे बचाने के लिए। वापसी में बचे हुए पैसे से घर के लिए स्टेशन के पास से भांजी खरीद कर ले जाती थी।”

इसी बातचीत में उन्होंने कहा था, ‘‘स्टूडिया में लोग कैंटीन खोजते थे। वहां कुछ खाने पीने के लिए जाते थे। मैं वहां दिन दिन भर कमरे में रहती थी। खाने को कुछ नहीं लेती थी।’’ जावेद ने उनसे एक सवाल किया था कि आप को कोई गाना मुश्किल लगा हो, ऐसा कभी हुआ? तो लता जी का उत्तर था, ‘‘शुरू-शुरू में। शुरू में किसी किसी गाने को लेकर लगता है कि यह मुश्किल है….।’’

सुर साम्राज्ञी लताजी ने इस संदर्भ में विशेष रूप से सज्जाद जी का नाम लिया और कहा कि वह ‘बहुत पर्टीकुलर’ (विशिष्टता पर बहुत अधिक बल देने वाले ) थे। उनके दिमाग में अरब का संगीत रहता था। वह नहीं चाहते थे कि अलाप बहुत ऊंचा हो। भारत रत्न से अलंकृत स्वर-सम्राज्ञी ने जावेदजी से बातचीत में इसी संदर्भ में कहा,‘‘ध्यान रखना पड़ता है, म्यूजिक डारेक्टर को यह न लगे कि हमने क्या बनाया, इसने क्या गा दिया।’’

इस बात पर जावेद अख्तर ने उनसे विनोदपूर्ण ढंग से कहा,‘‘आप के हर गाने में तो यही होता था। म्यूजिक डारेक्टर क्या बनता था और आप उसका क्या कर देती थीं।’’ इस पर उन्होंने खिलखिला कर हंसा था। उन्होंने कोई गाना गारे की जावेद साहब की फर्माइश पर बस इतना भर कहा— ये क्या बोलता तू— और दोनों के साथ स्टूडियो में दर्शकों का जोर का ठहाका उभर आया था।

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