पीलीभीत: कहीं मुफ्त के चक्कर में पटरी से न उतर जाए बिजली व्यवस्था
आशुतोष शर्मा, पीलीभीत। अगर आप यह सोच रहे हैं कि नई सरकार बनने के बाद अच्छी और मुफ्त बिजली मिलेगी तो यह सोच गलत है। क्योंकि जब बिजली मुफ्त मिलेगी तो उसका दुरुपयोग भी निश्चित होगा। जिस वजह से मौजूदा सिस्टम पर अतिरिक्त भार पड़ेगा और सिस्टम ओवरलोड होगा। फिर ब्रेकडाउन होने पर बिजली गुल …
आशुतोष शर्मा, पीलीभीत। अगर आप यह सोच रहे हैं कि नई सरकार बनने के बाद अच्छी और मुफ्त बिजली मिलेगी तो यह सोच गलत है। क्योंकि जब बिजली मुफ्त मिलेगी तो उसका दुरुपयोग भी निश्चित होगा। जिस वजह से मौजूदा सिस्टम पर अतिरिक्त भार पड़ेगा और सिस्टम ओवरलोड होगा।
फिर ब्रेकडाउन होने पर बिजली गुल होना तो तय है। इससे निजात पाने के लिए लोगों को इनवर्टर और जेनरेटर का सहारा लेना पड़ेगा, ऐसे में बिजली खर्चा कम होने के बजाय और बढ़ेगा ही।विधानसभा चुनाव में मतदाताओं को लुभाने के लिए सभी राजनैतिक दलों ने तरह-तरह की घोषणाएं कीं तो वहीं बिजली का मुद्दा सबसे अहम रहा।
प्रदेश में ज्यादातर शहरों में 22 से 24 घंटे बिजली आती है वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में भी 18 से 20 घंटे मिलती है। इसलिए ज्यादा बिजली देने जैसा मुद्दा तो किसी भी राजनैतिक पार्टी के पास नहीं बचा। लेकिन हां बिजली दरें जरूर बड़ा चुनावी मुद्दा है। इसको लेकर सभी राजनैतिक पार्टियों ने अपने-अपने घोषणा पत्रों में बिजली मुफ्त देने के वादे किए हैं।
सपा ने घरेलू इस्तेमाल के लिए 300 यूनिट व सिंचाई के लिए फ्री बिजली देने का वादा किया है तो वहीं भाजपा ने भी सिंचाई के लिए मुफ्त बिजली देने का ऐलान किया है। इसके साथ ही कांग्रेस भी वादे करने में पीछे नहीं है, इस पार्टी ने भी अपने घोषणा पत्र में बिजली बिल आधा करने की बात कही है। आम आदमी पार्टी ने भी घरेलू और सिंचाई के लिए मुफ्त बिजली देने के वादे किए हैं।
नई सरकार में बिजली की दरों में बढ़ोत्तरी
पार्टी कार्यकाल दरों में बढ़ोत्तरी
बसपा 2007-12 24 से 25 फीसदी
सपा 2012-2017 50 से 55 फीसदी
भाजपा 2017-2022 26 से 28 फीसदी
बिजली आपूर्ति का वार्षिक औसत
वर्ष ग्रामीण क्षेत्र शहरी क्षेत्र
2012-13 11.27 21.42
2016-17 16.39 23.41
2017-18 18.35 23.58
2021-22 18.10 24.00
बिजली फ्री होने से बढ़ेगी मंहगाई
जिस हिसाब से राजनैतिक पार्टियों ने मुफ्त बिजली देने का वादा किया है। उस हिसाब से तो कॉमर्शियल बिजली की दरों में इजाफा होना तय है। भले ही घरेलू उपभोक्ताओं व किसानों की दरों में वृद्धि न की जाए लेकिन कॉमर्शियल व औद्योगिक बिजली पर भार बढ़ सकता है।
कंपनियों पर पहले से ही उत्पादकों से खरीदी गई बिजली की बड़ी देनदारी है। ऐसे में घाटे की भरपाई करने के लिए बिजली की दर बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा और जब बिजली के दामों में वृद्धि होगी तब कंपनियों से आने वाला सामान का मंहगा होना भी तय है।
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