Eisenmenger syndrome नाम की दुर्लभ बीमारी से पीड़ित थी गर्भवती महिला, केजीएमयू के चिकित्सकों ने बचाई जच्चा-बच्चा की जान

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लखनऊ। केजीएमयू में चिकित्सकों की टीम ने कठिन परिश्रम कर Eisenmenger syndrome नाम की दुर्लभ बीमारी से पीड़ित एक गर्भवती महिला का सफल ऑपरेशन कर उसकी जान बचाई है। इतना ही नहीं महिला का बच्चा भी पूरी तरीके से स्वस्थ बताया जा रहा है। इस तरह के दुर्लभ बीमारी से पीड़ित महिला को जीवनदान देने …

लखनऊ। केजीएमयू में चिकित्सकों की टीम ने कठिन परिश्रम कर Eisenmenger syndrome नाम की दुर्लभ बीमारी से पीड़ित एक गर्भवती महिला का सफल ऑपरेशन कर उसकी जान बचाई है। इतना ही नहीं महिला का बच्चा भी पूरी तरीके से स्वस्थ बताया जा रहा है। इस तरह के दुर्लभ बीमारी से पीड़ित महिला को जीवनदान देने के बाद केजीएमयू के इतिहास में एक नया कीर्तिमान जुड़ गया है।

बताया जा रहा है कि इस दुर्लभ बीमारी से 30 से 40 लाख लोगों में कोई एक शख्स पीड़ित होता है। इतना ही नहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक इस दुर्लभ बीमारी से पीड़ित महिला को गर्भ धारण करने से बचना चाहिए। आंकड़ों की माने तो Eisenmenger syndrome नाम की दुर्लभ बीमारी से पीड़ित 65% गर्भवती महिलाओं का जीवन बचा पाना काफी कठिन होता है।

दरअसल, 25 वर्षीय एक गर्भवती महिला बीते 17 फरवरी को गंभीर हालत में केजीएमयू के क्वीनमेरी अस्पताल में पहुंचती है। वहां पर मौजूद डॉक्टर सीमा तथा डॉ. मोनिका मरीज को भर्ती कर उसका इलाज शुरू करती हैं। कार्डियक एंड एनेस्थीसिया विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर करण कौशिक बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में पहला ऐसा मामला होगा, जिसमें गंभीर हालत के बावजूद प्रसूता तथा नवजात की जान बचाई जा सकी है।

उन्होंने बताया कि इस मरीज के इलाज में हमें कई सावधानियां बरतनी थी, जिसका पूरी टीम ने गहन अध्ययन किया। सर्जरी के बाद प्रसूता को 5 दिन तक चिकित्सकों के सघन निगरानी में रखा गया, 27 फरवरी को महिला के स्वस्थ होने पर जच्चा तथा बच्चा दोनों को छुट्टी दे दी गई।

क्या है Eisenmenger syndrome

डॉ. करण कौशिक की माने तो व्यवहारिक भाषा में Eisenmenger syndrome हृदय की सबसे आखरी बीमारी होती है। यह बीमारी 30 से 40 लाख की आबादी में किसी एक शख्श को होती है। उन्होंने बताया कि जब हार्ट में छेद हो जाता है और उसका समय रहते इलाज नहीं कराया जाता, सर्जरी नहीं कराई जाती, जिसके बाद हार्ट से फेफड़ों तक रक्त में ऑक्सीजन ले जाने वाली धमनिया खराब हो जाती है। ऐसे मरीजों की जिंदगी की उम्र काफी कम बताई जाती है।

महिला को जीवनदान देने वाली चिकित्सकीय टीम

डॉ. सीमा, डॉ मोनिका, एनएसथीसिया एवं क्रिटिकल केयर के विभागाध्यक्ष डॉ जी पी सिंह,असिस्टेंट प्रोफेसर कार्डियक एनएसथीसिया डॉक्टर करण कौशिक, एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. तन्मय तिवारी, डॉ. जिया अरशद, डॉ रति प्रभा, डॉ. अंकुर शामिल रहे।

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