रायबरेली ने चुनाव में रचे एक साथ कई इतिहास, जानें डिटेल

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Edited By Amrit Vichar
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रायबरेली। संपन्न हुए विधान सभा में इस बार रायबरेली की जनता ने कई इतिहास रच डाले हैं। जिले में जहां सपा ने एक दशक बाद इतिहास दोहराया है, वहीं बागियों को जनता ने सबक सिखाकर उनको नकार दिया है। रायबरेली में सबसे चर्चित सीट रही ऊंचाहार में अब कांग्रेस के बाद सपा ऐसी पार्टी बन …

रायबरेली। संपन्न हुए विधान सभा में इस बार रायबरेली की जनता ने कई इतिहास रच डाले हैं। जिले में जहां सपा ने एक दशक बाद इतिहास दोहराया है, वहीं बागियों को जनता ने सबक सिखाकर उनको नकार दिया है।

रायबरेली में सबसे चर्चित सीट रही ऊंचाहार में अब कांग्रेस के बाद सपा ऐसी पार्टी बन गई है , जो लगातार तीसरी बार यहां पर काबिज हुई है। इससे पहले कांग्रेस के स्व  कुंवर हरनारायण सिंह लगातार चार बार विधायक निर्वाचित हुए थे। अब सपा के डा मनोज पांडेय ने लगातार तीसरी बार इस सीट पर कब्जा करके अपना दबदबा बढ़ाया है। इस बार उन्होंने 6621 मतों के अंतर से भाजपा के प्रदेश महासचिव अमर पाल मौर्य को शिकस्त दी है। बीते तीन चुनावों में यह सपा की सबसे बड़ी जीत है।

चुनाव से पहले दलबदल और बगावत करने वालों को भी जनता ने नकार दिया है। केवल सदर सीट से अदिति सिंह एकमात्र ऐसी बागी है , जिन्हे जीत मिली है। इनके अलावा हरचंदपुर सीट से कांग्रेस के बागी और भाजपा उम्मीदवार राकेश सिंह को हार का सामना करना पड़ा है। इसी सीट से सपा से बागी होकर कांग्रेस से चुनाव लडने वाले पंजाबी सिंह की भी बुरी हार हुई है। वह तीसरे स्थान पर रहे। उधर बछरावां सीट पर सपा का टिकट कटने से बागी होकर सपा को हराने का दंभ भरने वाले पूर्व विधायक रामलाल अकेला भी भाजपा के लिए बेकार साबित हुए हैं। यह सीट सपा ने जीत ली है। जबकि ऊंचाहार में भाजपा से बगावत करके कांग्रेस से चुनाव लडने वाले अतुल सिंह की बड़ी शर्मनाक हार हुई है। उन्हे मात्र 9985 मत ही प्राप्त हुए और वह चौथे स्थान पर रहे।

प्रदेश की सत्ता पर भाजपा ने भले ही कब्जा कर लिया हो , किंतु प्रदेश की राजधानी से जुड़े जिले रायबरेली में सपा का जलवा रहा है। जिले की कुल छः विधान सभा सीटों में से चार पर कब्जा करके सपा ने भाजपा को कड़ी चुनौती दी है। यहां पर भाजपा केवल दो सीट ही जीत पाई है। जबकि 2017 के चुनाव में रायबरेली की तीन सीटों पर भाजपा ने कब्जा किया था।

चूक पर होता रहा मंथन

शुक्रवार का दिन भी राजनैतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए व्यस्तता भरा रहा। अलग अलग सीटों से जीते विधायकों के समर्थक दूसरे दिन भी जश्न में डूबे रहे। गोले दागे जाते रहे, कहीं मिठाइयां बांटी जाती रही , बधाइयों का दौर चलता रहा। दूसरी ओर हारे उम्मीदवारों के खेमे में इस बात पर मंथन होता रहा कि चुनाव में कहां कहां उनसे चूक हुई हैं? हर कोई अपनी अपनी गलतियों को तलाश रहा था। इंटरनेट मीडिया पर भी उत्साही समर्थकों की धूम रही। एक दूसरे को चिढ़ाने और उनको नीचा दिखाने के पोस्ट खुब वायरल हो रहे थे।

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