हरदोई: किसी ने इश्क-मुश्क,तो किसी ने छेड़े मुल्क परस्ती के तराने, आल इंडिया मुशायरा
हरदोई। उर्दू के सरपरस्त कहे जाने वाले बाबू हरिबहादुर श्रीवास्तव ने बरसों पहले शहर में एक मिसाल कायम करते हुए श्री रामलीला के आंगन में आल इंडिया मुशायरे की जो नीवं रखी थी,आज उसी नीवं पर गंगा-जमुनी तहज़ीब की मज़बूत इमारत बन कर खड़ी हो गई। गंगा-जमुनी तहज़ीब की रिवायत को दोहराते हुए उस आंगन …
हरदोई। उर्दू के सरपरस्त कहे जाने वाले बाबू हरिबहादुर श्रीवास्तव ने बरसों पहले शहर में एक मिसाल कायम करते हुए श्री रामलीला के आंगन में आल इंडिया मुशायरे की जो नीवं रखी थी,आज उसी नीवं पर गंगा-जमुनी तहज़ीब की मज़बूत इमारत बन कर खड़ी हो गई।
गंगा-जमुनी तहज़ीब की रिवायत को दोहराते हुए उस आंगन में जहां बुराई पर अच्छाई की जीत हुई थी, आल इंडिया मुशायरे की महफ़िल सजाई गई। मुशायरे में आए नामचीन शायरों में किसी ने इश्क-मुश्क की बातें की,तो किसी ने मुल्क परस्ती के तराने छेड़ते हुए महफ़िल में चार चांद लगा दिए। मुशायरे की सदारत जस्टिस सईदुज़्ज़मा ने की।
वहीं नदीम फर्रूख नाज़िम-ए-मुशायरे का बेहतरीन किरदार निभाया। मुशायरे का आग़ाज़ उभरते हुए गज़ल के शायर वसीम मज़हर ने किया। उन्होंने वतन परस्ती को लेकर बेहतरीन शायरी सुनाई। उन्होंने कहा ‘यही है मेरा हिंदुस्तान…,जिसकी फिज़ा में हर सू गूंजे गीता और कुरआन…’ सुन कर तालियों की तड़तड़ाहट गूंज गई।
आदिल रशीद ने अपनी मोहब्बत को कुछ इस तरह बयां किया ‘हैसियत अपनी पता है ये मगर वादा है,मै किसी को तेरा दिल नहीं दुखाने दूंगा,मै तेरी मांग में तारे तो नहीं भर सकता, हां मगर आंख में आंसू नहीं आने दूंगा’। बरेली से आईं गज़ल की नामवर शायरा शाइस्ता सना ने उर्दू की पहचान कुछ इस कराई ‘हर एक मौसम की पहचान में रहती हूं, खुश्बू बन कर मैं गुलदान में रहती हूं, हिंदू-मुस्लिम सब करते हैं प्यार मुझे,मै उर्दू हूं हिन्दुस्तान में रहती हूं’।
अज़्म शाकरी ने कुछ यूं कहा ‘बड़ी सर्द हैं हवाए शबे ग़म पिघल रहा है,वो धुंआ सा उठ रहा है को शाख जल रही है’ बाहरी मुल्कों में उर्दू की मज़बूत पैरवी करने वाली शायरा शबीना अदीब के गीत-ग़ज़ल खूब पसंद किए गए। उन्होंने अपना पैग़ाम कुछ इस तरह दिया ‘अंधेरों की हर साजिश यहां नाकाम हो जाए,उजाले हर तरफ हों रोशनी का नाम हो जाए,मेरी कोशिश तो दिलों से नफरत को दूर करना है,मेरा मक़सद है मुहब्बत आम हो जाए’।
इसी कड़ी में जौहर कानपुरी ने वतन परस्ती पर शक करने वालों को अपना पैग़ाम कुछ इस तरह दिया ‘मै मर भी जाऊं तो धरती गोद में रखती है,अब इतना ग़ैर का बच्चा प्यारा हो नहीं सकता’। बिलाल सहारनपुरी ने भी मुल्क के आपसी भाईचारे की गवाही इस तरह पेश की, उन्होंने कहा ‘पहले हर आदमी इंसान हुआ करता था,बाद में हिंदू-मुसलमान हुआ करता है’।
दिल्ली से आए आदिल रशीद ने कहा ‘… दिखाई कुछ नहीं देता मगर अल्लाह की कुदरत,कि बच्चा सांस की खुश्बू से अम्मी ढ़ूढ़ लेता है’। हसीब सोज़ ने कहा ‘तेरी मदद का यहां तक हिसाब दे देना,चराग़ ले के मुझे आफताब दे देना’। अलीगढ़ से आए कलीम समर ने भी उर्दू की कड़ियों को मिलाते हुए बेहतरीन कलाम सुनाए।
उर्दू की हिमायत करने वाले रात की तीसरी पहर तक चली इस महफिल में डटे रहे। पूर्व चेयरमैन रामप्रकाश शुक्ला ने आए हुए सभी मेहमानों का शुक्रिया अदा किया। इस बीच बाबू हरिबहादुर श्रीवास्तव की बेटी मनमन श्रीवास्तव,रंजना सिंह,वसीम अहमद सिद्दीकी, राकेश गुप्ता, अदनान,आलम रब्बानी,प्रीतेश दीक्षित, राकेश बाजपेई, अरुणेश बाजपेई,बाबू अली, संजय शुक्ला, रिंकू गुप्ता मौजूद रहे।
यह भी पढ़ें-अमेठी: खनन माफिया खनन कर डम्परों में भरवाकर बेच रहे है, तालाब की मिट्टी
