बहराइच: तेंदुए के हमले से बचने के लिए वन विभाग ने बताए टिप्स, लोगों को किया जागरूक
बहराइच। जिले में गन्ने की फसलों की कटाई हो चुकी है। जबकि किसान खेत से गेहूं की फसल काट रहे हैं। ऐसे में तेंदुए अपने वास के लिए भटकेंगे, जिससे हमले भी बढ़ सकते हैं। ऐसे में खेत में जाने वाले लोग समूह में बात करते हुए जाएं। ऐसे में तेंदुए के हमले से बचा …
बहराइच। जिले में गन्ने की फसलों की कटाई हो चुकी है। जबकि किसान खेत से गेहूं की फसल काट रहे हैं। ऐसे में तेंदुए अपने वास के लिए भटकेंगे, जिससे हमले भी बढ़ सकते हैं। ऐसे में खेत में जाने वाले लोग समूह में बात करते हुए जाएं। ऐसे में तेंदुए के हमले से बचा जा सकता है।
बहराइच जनपद में कतरनियाघाट वन्यजीव प्रभाग और बहराइच वन प्रभाग का जंगल है। कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग में बाघ और तेंदुए काफी मात्रा में पाए जाते हैं। जबकि बहराइच वन प्रभाग में तेंदुए की संख्या 20 के आसपास है। प्रभागीय वनाधिकारी बहराइच वन प्रभाग मनीष सिंह ने बताया कि जिले में गन्ने और गेहूं की खेती काफी मात्रा में होती है। ऐसे में तेंदुए गन्ने और गेहूं के खेत को ही अपना वास बना लेते हैं। लेकिन गन्ने की फसल पूरी तरह कट चुकी है। जबकि गेहूं की फसल काटी जा रही है।
ऐसे में तेंदुए अपना नया ठिकाना बना सकते हैं। तेंदुए के नए ठिकाने बनने पर ग्रामीणों पर भी हमला हो सकता है। डीएफओ ने बताया कि तेंदुए के हमले से बचने के लिए ग्रामीण अपने खेत में समूह में जाएं। साथ ही समूह में बात करते रहें। क्योंकि मानव दखलंदाजी देखकर तेंदुआ काफी दूर रहता है। जिससे हमले रोके जा सकते हैं। उन्होंने बताया कि किसी भी जीव का अगर वास छूटता है तो दिक्कत होती है। ऐसे में जागरूकता के द्वारा ही हमले कम किए जा सकते हैं।
तीन दिन पूर्व अहाते में दिया था जन्म
कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग के चहलवा भेड़हनपुरवा गांव निवासी कुंजीलाल के मकान के बगल में अहाता बना हुआ है। जहां पर झाड़ियां लगी हुई हैं। झाड़ियों के बीच अहाते में तेंदुए ने बच्चे को जन्म दिया था।
गन्ना की फसल को मानते हैं जंगल
प्रभागीय वनाधिकारी कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग आकाशदीप वधावन ने बताया कि जंगल से सटे गांवों के किसान गन्ने की खेती अधिक करते हैं। गन्ने की फसल छह माह तक काफी बड़ी होने के साथ झाड़ी नुमा होती है। जिसे तेंदुआ अपना निवास स्थान बना लेते हैं। डीएफओ मनीष सिंह ने बताया कि गेहूं की खेती भी तेंदुओं के लिए वास स्थान बन जाता है। ऐसे में ग्रामीणों की सतर्कता ही बचाव है।
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