बढ़ती उम्र के साथ सूंघने की क्षमता कम होने पर हो जायें सावधान, पार्किंसन बीमारी के हो सकते हैं लक्षण : डॉ. रुचिका टंडन
लखनऊ। यदि बढ़ती उम्र में किसी को सुगन्ध अथवा दुर्गन्ध आना बंद हो जाये, साथ ही कब्ज की दिक्कत हो तो यह पार्किंसन रोग का शिकार हो सकता है। यह कहना है एसजीपीजीआई के न्यूरोलॉजी विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर रुचिका टंडन का। उन्होंने यह बातें विश्व पार्किंसन दिवस के अवसर पर कहीं। उन्होंने कहा कि …
लखनऊ। यदि बढ़ती उम्र में किसी को सुगन्ध अथवा दुर्गन्ध आना बंद हो जाये, साथ ही कब्ज की दिक्कत हो तो यह पार्किंसन रोग का शिकार हो सकता है। यह कहना है एसजीपीजीआई के न्यूरोलॉजी विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर रुचिका टंडन का। उन्होंने यह बातें विश्व पार्किंसन दिवस के अवसर पर कहीं।
उन्होंने कहा कि पार्किंसन रोग केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की एक बीमारी है, जो मस्तिष्क में तंत्रिका कोशिकाओं के नुकसान के कारण होती है, इसमें डोपामाइन रसायन का स्तर गिर जाता है, जिसके बाद पार्किंसंस बीमारी के लक्षण सामने आते हैं। पार्किंसंन बीमारी की जानकारी ज्यादातर मामलों में तब होती है जब हाथों और पैरों में कंपन शुरू हो जाता है।
लेकिन पार्किंसंस के शुरुआती लक्षणों में पहले सुघंने की शक्ती का कमजोर होना देखा गया है। उन्होंने बताया कि रोग बढ़ने पर धीरे-धीरे शरीर की गति को धीमा करने और अंगों में अकड़न और संतुलन खोने के लक्षणों दिखाई पड़ते है। उन्होंने बताया कि उत्तर भारत में करीब एक लाख की आबादी में में 67 लोग इस बिमारी से पीड़ित हैं। वहीं यह बीमारी 50 साल से अधिक उम्र के लोगों में ज्यादा पायी जाती है।
पार्किंसंस रोग के कारण
डॉ.रूचिका के मुताबिक कम उम्र में यदि किसी को पार्किंसंस रोग होता है,तो उसका कारण आनुवंशिक हो सकता है,इसके अलावा इस रोग के होने के प्रमुख कारणों में प्रदूषण तथा कीटनाशकों का प्रयोग हो सकता है। आज विश्व पार्किंसन दिवस के अवसर पर संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान के न्यूरोलॉजी विभाग, द्वारा पारकिन्संस रोग के बारे में जागरूकता फैलान को लेकर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर न्यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर सुनील प्रधान ने कहा कि चरक संहिता और आत्रेय संहिता में पार्किंसंस रोग के लक्षणों, कारणों और उपचार का उल्लेख है, जिसका वर्णन डॉ. पार्किंसन ने वर्षों बाद 1817 में किया था।
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