मुरादाबादी जलवायु में कीवी के पौधे मुस्कुराए, चार साल बाद आने लगेंगे फल

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मुरादाबाद,अमृत विचार। डेंगू जैसी खतरनाक बीमारी में कीवी फल को मुरादाबाद की मिट्टी और हवा पसंद आ रही है। मनोहरपुर स्थित जार्ड्स के एग्री क्लीनिक और एग्रीबिजनेस सेंटर की बागवानी में इसका प्रयोग सफल पाया गया है। पौधे के विकास से उत्साहित केंद्र संचालक ने किसानों को इसकी बागवानी से जोड़ने का ताना-बाना बुनना तेज …

मुरादाबाद,अमृत विचार। डेंगू जैसी खतरनाक बीमारी में कीवी फल को मुरादाबाद की मिट्टी और हवा पसंद आ रही है। मनोहरपुर स्थित जार्ड्स के एग्री क्लीनिक और एग्रीबिजनेस सेंटर की बागवानी में इसका प्रयोग सफल पाया गया है। पौधे के विकास से उत्साहित केंद्र संचालक ने किसानों को इसकी बागवानी से जोड़ने का ताना-बाना बुनना तेज कर दिया है।

यूपी के तराई क्षेत्र, हिमांचल तथा उत्तर पूर्व के राज्यों में इसकी बागवानी हो रही है। कृषि और बागवानी विशेषज्ञ कहते हैं कि दोमट मिट्टी और सामान्य जलवायु इसे पसंद है। पौध की कलम जनवरी महीने में लगाई जाती है। लकड़ी और लोहे के स्टैंड पर इसके लताओं को चढ़ाया जाता है। बोवाई के दौरान हर पौधे में 20 किलोग्राम गोबर की खाद, 500 ग्राम एनपीके का उपयोग श्रेयस्कर माना गया है।

पौधे को अम्लीय और समतल मिट्टी पसंद है, इसके पौधे को बहुत वर्षा नहीं चाहिए। गर्मी से भी इसका परहेज है। यानी औसतन 30 डिग्री सेल्सियस पर इसका भरण-पोषण संभव है। कृषि और बागवानी विशेषज्ञ डा. जय कुमार सिंह कहते हैं कि एक पौध सीजन में 80 से 100 किलोग्राम तक फल देता है। जुलाई के महीने में पौधे से फल तोड़े जाते हैं। कतार में चार मीटर की दूरी पर इसके पौधे रोपे जाते हैं। पौधे से पौधे के बीच में पांच से सात मीटर की दूरी रखनी होती है, इसके पौधे को गड्ढे में रोपा जाता है। आरंभिक तौर पर मुरादाबाद की मिट्टी इसे भा रही है। आरंभिक दो साल में न्यूनतम खाद की जरूरत होती है।

डा. सिंह कहते हैं कि इसके पौधे पर कोई रोग नहीं लगता है। चार साल बाद फल आना शुरू हो जाता है। फरवरी में पौधे में फूल दिखता है और अक्टूबर से नवंबर तक फल तैयार हो जाता है। एक हेक्टेयर में 40 से 50 टन फल निकलता है। एक एकड़ में 20 से 25 लाख की सालाना आमदनी संभव है।

कीवी की प्रजातियां
इस फल में नर और मादा दोनों होते हैं। नर किस्म में एलीसन, मुतवा और तमूरी प्रमुख है। जबकि मादा प्रजाति में एलिसन ब्रूनों, हैवर्ड और मोंटी होते हैं। हैवर्ड का सर्वाधिक उत्पादन न्यूजीलैंड में होता है। यह फल जल्दी खराब नहीं होता है। पड़ोसी राज्य के रानीखेत, चमोली, पिथौरागढ़ और डुंडा में इसकी खेती अधिक होती है।

असम से लाए पौधे केंद्र पर रोपे गए हैं। सभी पौधों में कल्ले निकल आए हैं और उनके विकास का क्रम अच्छा दिख रहा है। इससे इस बात की पुष्टि हो रही है कि मुरादाबाद की मिट्टी और यहां का जलवायु इस प्रजाति के लिए अच्छी है। केंद्र में इसकी बागवानी की शिक्षा नए बैच के सदस्यों को दी जाएगी। हम लोगों को इसके लिए तैयार करेंगे। -डा. दीपक मेंदीरत्ता, नोडल अधिकारी जार्ड् स (मनोहरपुर)

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