मुरादाबाद : पुलिस को अब ढूंढे से भी नहीं मिल पा रहा है मुखबिर का किरदार, जानिए क्यों?

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श्रीशचंद्र मिश्र/अमृत विचार पुलिस और मुखबिर, यानी कि एक ही कहानी के वह दो किरदार, जिनका वजूद एक-दूसरे के बगैर अधूरा है। किसी भी अपराध के अनावरण की पुलिसिया पटकथा पर गौर करें। पता चलेगा कि मुखबिर व पुलिस की फर्द का नाता वर्षों पुराना है। पुलिस को मुखबिर का सहारा लेना ही पड़ता है। …

श्रीशचंद्र मिश्र/अमृत विचार पुलिस और मुखबिर, यानी कि एक ही कहानी के वह दो किरदार, जिनका वजूद एक-दूसरे के बगैर अधूरा है। किसी भी अपराध के अनावरण की पुलिसिया पटकथा पर गौर करें। पता चलेगा कि मुखबिर व पुलिस की फर्द का नाता वर्षों पुराना है। पुलिस को मुखबिर का सहारा लेना ही पड़ता है। मगर, अपराध व अपराधियों की नकेल कसने वाला यह रिश्ता अब मिटने की कगार पर है, क्योंकि समय ने पुलिस व मुखबिरों के बीच की खाई चौड़ी की है। पुलिस को अब ढूंढ़ने से नहीं मिल रहा मुखबिर का किरदार नहीं मिल रहा है।

पुलिस की डायरी दावा करती है कि अंग्रेजी शासन काल से ही समाज में मुखबिर तंत्र विकसित करने की परंपरा रही है। आजादी के बाद भी अपराध व अपराधियों पर मुखबिरों के जरिए ही पुलिस नजर रखती थी। शासन से मुखबिरों के लिए बाकायदा धन स्वीकृत होते थे। बदले परिदृश्य में मुखबिरों की भूमिका गौड़ हो गई और उनकी जगह सर्विलांस व इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों ने ले ली है। मगर, पुलिस की जीडी व फर्द मुखबिरों के बगैर अधूरी है। शराब, असलहा, कारतूस के साथ आरोपियों की गिरफ्तार में पुलिस मुखबिर तंत्र के शामिल होने का दावा करती है।

पुलिस का यह दावा फिलहाल सच से परे होता जा रहा है। जिन घटनाओं के अनावरण में पुलिस का सर्विलांस सेल फेल होता है, उसका पर्दाफाश नामुमकिन हो गया है। महानगर का डॉ. शैली हत्याकांड विफलता का नजीर बनकर यहां पुलिस के सिर पर चस्पा है। 2014 में डॉक्टर दंपति समेत चार लोगों की घर में घुसकर निर्मम हत्या की घटना का पर्दाफाश पुलिस अब तक नहीं कर पाया। तीन सूत्रों पर टिका था मुखबिर तंत्र पुलिस का मुखबिर तंत्र तीन सूत्रों पर टिका था। पहले सूत्र के तहत स्थानीय पुलिस या एसओजी अपने निजी खर्चे पर मुखबिर खड़ा करती थी। किसी बड़े काम के होने पर पुलिस अपने हिस्से की एक चौथाई रकम मुखबिरों को देती थी। इससे पुलिस व मुखबिर दोनों की जरूरतें पूरी होती थीं।

दूसरे सूत्र के तहत आपराधिक कृत्य से मिलने वाले धन का व्यय पुलिस अपने मुखबिर पर करती थी। धन की शर्त पर ही पुलिस कुछ चिह्नित लोगों को गैरकानूनी कार्य की छूट देती थी। तीसरे सूत्र पीपीपी ( पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) पर आधारित है। इसके तहत मुखबिर के गैरकानूनी कृत्य में शामिल होने के बाद भी पुलिस आंख मूंद लेती थी। पुलिस व मुखबिरों के रिश्ते में अपराध के उपजने की घटनाओं पर उच्चाधिकारियों ने नकेल कसनी शुरू कर दी। यहां तक कि मुखबिरों की हत्याएं होने लगीं।

सर्विलांस भी दे रहा दगा
मुखबिर तंत्र को दरकिनार कर पुलिस ने जिस सर्विलांस पर भरोसा किया था, वह अब दगा देने लगा है। शातिर बदमाश सर्विलांस व पुलिस की आंख में धूल झोंकने लगे हैं। कई गंभीर अपराध का अनावरण न होने का यह बड़ा कारण बनता जा रहा है। सेवानिवृत्त सीओ बीके सिंह के मुताबिक शातिर अपराधी एक ही पहचान पत्र पर कई मोबाइल व सिमकार्ड खरीद रहे हैं। ऐसे में घटनास्थल पर अपराधी की मौजूदगी को लेकर पुलिस भ्रम का शिकार हो रही है। इस परिस्थिति में सर्विलांस भी पुलिस की मदद करने में विफल है।

मुखबिरों पर अब नहीं होती बैठकों में चर्चा
उच्चाधिकारी व पुलिसकर्मियों के बीच बैठक में मुखबिर तंत्र पर चर्चा अब नहीं होती। महकमे के आलाधिकारी मुखबिर तंत्र को नए सिरे से सक्रिय करने को लेकर उदासीन हैं। एक अधिकारी बताते हैं कि पूर्व में कई ऐसे मामले प्रकाश में आए, जब मुखबिरों की मदद या उनसे संबंध होने के आरोप में कई पुलिसकर्मियों के खिलाफ विभागीय व कानूनी कार्रवाई की गई। मुखबिरों के संपर्क में रहने वाले पुलिस अधिकारी के साथ विभागीय अधिकारी अपराधी की भांति बर्ताव करने लगे। ऐसे में पुलिसकर्मियों ने भी मुखबिरों से किनारा कर लिया।

गंभीर अपराध में रहती है अहम भूमिका
सेवानिवृत्त इंस्पेक्टर उदय शंकर सिंह बताते हैं कि गंभीर अपराध के खुलासे में मुखबिर की अहम भूमिका होती है। मीटिंग में मुखबिर तंत्र पर चर्चा नहीं होती। आला अफसर मुखबिर तंत्र को नए सिरे से सक्रिय करने को लेकर उदासीन हैं। पूर्व में कई ऐसे प्रकरण प्रकाश में आए, जब मुखबिरों की मदद के आरोप में पुलिस कर्मियों पर गाज गिरी। मुखबिरों के संपर्क में रहने वाले पुलिस अधिकारी के साथ अफसर अपराधी की भांति बर्ताव करने लगे। ऐसे में पुलिस कर्मियों ने मुखबिरों से किनारा लिया।

एसपी क्राइम अशोक कुमार ने बताया कि निसंदेह पुलिस व मुखबिरों के बीच दूरी बढ़ी है, लेकिन संबंध पूरी तरह खत्म होना मुमकिन ही नहीं है। पूर्व में मुखबिरों की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण रही, क्योंकि अपराध पर जुबान खोलने से आम लोग कतराते थे। सर्विलांस ने भी मुखबिरों की भूमिका सीमित की है। कई ऐसी घटनाएं हैं, जिनके अनावरण में मुखबिरों का रोल महत्वपूर्ण रहा है।

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