जानलेवा हादसे

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Edited By Amrit Vichar
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भारत में प्रतिदिन 415 लोग सड़क हादसों में मारे जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया भर में सड़क हादसों में मारे गए 10 लोगों में से कम से कम एक भारत से होता है। इसके बावजूद यात्रियों व चालकों की सुरक्षा केंद्र सरकार व राज्य सरकारों की पहली प्राथमिकता नहीं है। रविवार को …

भारत में प्रतिदिन 415 लोग सड़क हादसों में मारे जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया भर में सड़क हादसों में मारे गए 10 लोगों में से कम से कम एक भारत से होता है। इसके बावजूद यात्रियों व चालकों की सुरक्षा केंद्र सरकार व राज्य सरकारों की पहली प्राथमिकता नहीं है। रविवार को उत्तराखंड के उत्तरकाशी मं।

यमुनोत्री राजमार्ग पर एक भयावह सड़क हादसे में चारधामा यात्रा के 26 तीर्थयात्रियों की मौत हो गई। दुखद है कि मध्यप्रदेश से तीर्थयात्रा पर निकले श्रद्धालुओं को मौत मिली। पिछले सप्ताह बरेली में एक एंबुलेंस व ट्रक की टक्कर में सात लोगों की मौत हो गई। ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब किसी बड़ी सड़क दुर्घटना में लोग बेमौत न मारे जाते हों। दुखद यह भी है कि मरने वाले लोग निर्दोष होते हैं और किसी दूसरे की लापरवाही का खमियाजा भुगतते हैं।

हाल ही में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा जारी की गई ‘भारत में सड़क दुर्घटनाएं-2020’ रिपोर्ट कई खुलासे करती है। रिपोर्ट में चौंकाने वाली बात यह है कि करीब 67 फीसदी हादसे निर्धारित सीमा से तेज गति से चलने वाले वाहनों की वजह से होते हैं। इसके साथ ही करीब 26 फीसदी हादसे लापरवाही से वाहन चलाने या ओवरटेकिंग की वजह से होते हैं।

इससे पहले अंतर्राष्ट्रीय सड़क संगठन (आईआरएफ) की रिपोर्ट में कहा गया था कि दुनिया भर में वाहनों की कुल संख्या का महज तीन फीसदी भारत में है, लेकिन देश में होने वाले सड़क हादसों और इनमें जान गंवाने वालों के मामले में भारत की हिस्सेदारी 12.06 फीसदी है। केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के मुताबिक सड़क दुर्घटनाओं में मरने वाले लोगों की वजह से देश को जीडीपी के 3.14 फीसदी के बराबर सामाजिक-आर्थिक नुकसान होता है।

कानून की सख्ती और जुर्माना अधिक होने के बावजूद लोग सड़क सुरक्षा को हल्के में लेते हैं। सड़क दुर्घटना के कारण होने वाली मृत्यु की वजह से गरीब परिवारों की लगभग सात माह की घरेलू आय कम हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप पीड़ित परिवार गरीबी और कर्ज के चक्र में फंस जाता है। साल 2019 में मोटर व्हीकल कानून में संशोधन किया गया था। नई सड़कों के निर्माण और ट्रैफिक नियमों के कड़ाई से पालन की तमाम कवायद के बावजूद दुर्घटनाओं के आंकड़ों पर कोई अंतर नहीं पड़ा है।

सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सड़कों की सुरक्षा को परिवहन के मुद्दे के बजाय सार्वजनिक स्वास्थ्य के मुद्दे के रूप में देखा जाना चाहिए। हादसों पर अंकुश लगाने के लिए सबसे पहले राज्य सरकारों के साथ मिल कर वाहन चालकों में जागरुकता पैदा करनी होगी। लाइसेंस जारी करने से पहले तमाम मानकों की कड़ाई से जांच हो। सड़क सुरक्षा से संबंधित चुनौती से मिशन मोड में निपटा जाना चाहिए।