बरेली: कागजों में गांधी उद्यान का तालाब जीवित, धरातल पर पक्का निर्माण

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Edited By Amrit Vichar
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बरेली, अमृत विचार। तालाब का स्वरूप बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देश हैं । प्रशासन तालाब और सरोवरों को पुर्नजीवित भी कर रहा है, लेकिन स्मार्ट सिटी के तहत गांधी उद्यान में तालाब का स्वरूप ही बदल दिया गया है। तालाब के स्थान पर पक्का निर्माण कराकर इसे सौंदर्यीकरण का नाम दिया जा रहा …

बरेली, अमृत विचार। तालाब का स्वरूप बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देश हैं । प्रशासन तालाब और सरोवरों को पुर्नजीवित भी कर रहा है, लेकिन स्मार्ट सिटी के तहत गांधी उद्यान में तालाब का स्वरूप ही बदल दिया गया है। तालाब के स्थान पर पक्का निर्माण कराकर इसे सौंदर्यीकरण का नाम दिया जा रहा है। सिविल लाइंस, रामपुर बाग के कई पुराने लोग गांधी उद्यान के बिगड़ते स्वरूप और कम होते पेड़ों को लेकर चिंतित हैं। निगम के अफसर और जनप्रतिनिधियों के हरियाली के प्रति उदासीन रवैये को लेकर लोग मामले को मुख्यमंत्री दरबार में पहुंचाने की योजना बना रहे हैं।

शहर में लगभग 93 हजार वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला गांधी उद्यान पार्क जो कभी घने फलदार पेड़ों से आच्छादित रहता था, अब उद्यान में कई जगह ऐसी हैं जहां अब पेड़ नहीं हैं। सिविल लाइंस निवासी आरके वर्मा बताते हैं कि वह गांधी उद्यान में कई वर्ष से आ रहे हैं। जिस जगह तालाब हुआ करता था, वहां तालाब के किनारे आम में कई पेड़ थे। उन पेड़ों में आम भी आते थे, लेकिन अब वहां पेड़ों का नामोनिशान नहीं है। पूरी जगह खाली हो गई है।

तालाब यहां था, इसकी निशानी के तौर यहां तालाबनुमा जगह है, जहां इन दिनों पक्का निर्माण कराया जा रहा है। जहां हरियाली होनी चाहिए, वहां टाइल्स बिछाई जा रही है। वह बताते हैं कि अंग्रेजों के समय उद्यान में डामरयुक्त सड़कें नहीं थी। इससे बारिश होने पर पानी उद्यान में ही रहता था। यहां मई जून की धूप की गर्मी ही महसूस होती थी। लेकिन अब डामरयुक्त सड़कें भी धूप में तपती हैं और पेड़ों की कमी भी धूप का हर समय अहसास कराती हैं।

2001 में राज्यपाल मोती लाल वोरा दे गए थे 15 लाख रुपये
वर्ष 2001 में तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल वोरा ने तालाब के जीर्णोंद्वार के लिए 15 लाख रुपये दिए थे। उस समय वह खर्च नहीं किए गए। पूर्व मेयर के समय इस पार्क का स्वरूप बिगड़ना शुरू हुआ। तालाब के आसपास लगे पेड़ों को रातोंराट काट दिया गया। तालाब की जगह को व्यावसायिक बनाकर हरियाली को नष्ट किया गया। उसी समय तालाब का जीर्णोंद्वार किया गया तो उसमें राज्यपाल द्वारा दिए गए 15 लाख रुपये भी खर्च हुए। तालाब की चहारदीवारी तब बनाई गई थी, लेकिन उसके बाद जो भी नगर प्रमुख बने, उन्होंने भी शहर में सबसे बड़े हरियालीयुक्त उद्यान की हरियाली वापस लाने का प्रयास नहीं किया।

स्मार्ट सिटी के हवाले है गांधी उद्यान का तालाब
अब हालत यह हो गई है कि उद्यान में सुबह टहलने आने वाले लोग भी यहां की दुर्दशा से आहत हैं। वे इस बात से भी असंतुष्ट हैं कि जिले के जनप्रतिनिधि भी उद्यान के पुराने स्वरूप को लाने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। स्मार्ट सिटी के नाम पर हरियाली काटकर कंक्रीट की दीवारें खड़ी की जा रही हैं। वन और पर्यावरण मंत्री भी शहर के हैं, उनको भी अफसर वास्तविक जानकारी नहीं दे रहे हैं।

स्मार्ट सिटी के नाम पर अफसरों और जनप्रतिनिधियों की नाक के नीचे सड़क किनारे लगे छायादार पेड़ों पर आरी चला दी गई और किसी ने इस पर आपत्ति नहीं की। पेड़ काटने में जनप्रतिनिधियों के मौन रहने के कारण ही आज गांधी उद्यान में पेड़ों की कमी हो गई है। स्मार्ट सिटी के अफसरों ने आरटीआई में डा. प्रदीप कुमार को जानकारी दी कि गांधी उद्यान में तालाब का स्वरूप बदला नहीं गया है। तालाब का सौंदर्यीकरण किया जा रहा है।

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