संसद में गतिरोध
संसद का मानसून सत्र हंगामे की भेंट चढ़ता नजर रहा है। 18 जुलाई को सत्र शुरू होने के दिन से ही हंगामा जारी है। विडंबना है कि चर्चा और विमर्श के लिए बनी संसद में काम नहीं हो पा रहे हैं। अशोभनीय आचरण की वजह से चल रहे सत्र के दौरान अब तक 23 राज्यसभा …
संसद का मानसून सत्र हंगामे की भेंट चढ़ता नजर रहा है। 18 जुलाई को सत्र शुरू होने के दिन से ही हंगामा जारी है। विडंबना है कि चर्चा और विमर्श के लिए बनी संसद में काम नहीं हो पा रहे हैं। अशोभनीय आचरण की वजह से चल रहे सत्र के दौरान अब तक 23 राज्यसभा सांसद और चार लोकसभा सांसद समेत कुल 27 सांसदों को निलंबित किया जा चुका है। दरअसल, सदन की कार्यवाही को निर्बाध रूप से चलाने के लिए लोकसभाध्यक्ष व राज्यसभा के सभापति को सांसदों को निलंबित करने का अधिकार होता है।
देश के लोकतंत्र के इतिहास में सांसदों का सबसे बड़ा निलंबन वर्ष 1989 में हुआ था जब एक साथ लोकसभा के 63 सांसदों को निलंबित कर दिया गया था। सदन की कार्यवाही में आयकरदाताओं का करोड़ों रुपया खर्च होता है। ऐसे में सत्र के कई महत्वपूर्ण कार्य दिवसों का यूं ही व्यर्थ चले जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। जो दुनिया में सबसे बड़े लोकतंत्र की आकांक्षाओं के अनुरूप नहीं है। लगता है कि पक्ष-विपक्ष जनसरोकारों को तरजीह देने के बजाय अपने राजनीतिक निहितार्थों को तरजीह दे रहे हैं।
इस सारे घटनाक्रम को किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। सत्ता पक्ष के हों या विपक्ष के सांसदों को अधिकार नहीं है कि वे जनता के धन को फिजूल के हंगामें में नष्ट करें। सांसदों के ऐसे आचरण से संसद का राजनीति का अखाड़ा बनने से निश्चित रूप से लोकतंत्र कमजोर ही होगा। संसद सत्र न चलने के लिए किसी एक पक्ष को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। संसद के हर सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक होती है, ताकि दोनों पक्ष आपसी समझ विकसित करें और फिर संसद सत्र के सभी दिनों में पूरा कामकाज हो।
लेकिन अभी सर्वदलीय बैठक भी औपचारिकता मात्र रह गई है। संसद की कार्यवाही देखते समय सवाल उठता है कि आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे देश के नीति-नियंता 75 साल में कितने परिपक्व, जवाबदेह व जिम्मेदार हो पाए हैं? सत्ता पक्ष द्वारा विपक्ष के उठाए हुए मुद्दों को दबाना या उनकी उपेक्षा करना भी उचित नहीं है।
विपक्ष पर सरकार का आरोप है कि वह हंगामा कर चर्चा से बचता है। ऐसे में सत्तापक्ष का भी दायित्व है विपक्ष को अपने तर्क से संतुष्ट करे। संसद में होते हंगामे और उसकी गरिमा पर लगती चोट सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के लिए समान रूप से चिंता का विषय होना चाहिए। अत: इस स्थिति के लिए दोनों पक्ष ही जिम्मेदार हैं और दोनों ही पक्षों को इस पर मंथन करना चाहिए।
