बरेली के मुस्लिम नेताओं ने ठुकराई थी जिन्ना की टू नेशन थ्योरी

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बरेली, अमृत विचार। 15 अगस्त 1947 को हिंदुस्तान के आजाद होने की खुशी तो हर चेहरे पर थी, मगर विभाजन का दंश लोगों की आंखों में खटक रहा था। धर्म के आधार पर मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान तो बना लिया था बावजूद इसके मुसलमानों की एक बड़ी आबादी को वो अपनी तरफ करने में …

बरेली, अमृत विचार। 15 अगस्त 1947 को हिंदुस्तान के आजाद होने की खुशी तो हर चेहरे पर थी, मगर विभाजन का दंश लोगों की आंखों में खटक रहा था। धर्म के आधार पर मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान तो बना लिया था बावजूद इसके मुसलमानों की एक बड़ी आबादी को वो अपनी तरफ करने में नाकाम रहे। इनमें उस दौर के सैकड़ों मुस्लिम नेता भी शामिल हैं। जो जंग-ए-आजादी के आंदोलन से तो जुड़े ही साथ ही जब आजादी मिली तो विभाजन के दौरान पाकिस्तान नहीं गए।

आम तौर पर लोग प्रमुखता से देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद का नाम ही जानते हैं, जो भारत के मुसलमानों को पाकिस्तान जाने से रोक रहे थे। मगर छोटे शहरों में भी कई ऐसे मुस्लिम नेता हुए, जिनके बारे में कहा जाता है, वह अपनी झोलियां फैलाकर लोगों से आग्रह कर रहे थे कि वे पाकिस्तान न जाएं।

लोगों ने इनकी बात सुनी भी और पाकिस्तान जाने का अपना इरादा बदल दिया। बरेली में आजादी के दौरान बरेली में राजनीतिक छाप रखने वाले हाजी करामत उल्ला और फुरकान अहमद खान अज्म बरेलवी उन्हीं नेताओं में से एक हुए। इनमें से एक हाजी करामत उल्ला की तो चौथी पीढ़ी (इस्लाम साबिर व शहजिल इस्लाम) भी राजनीति में आज भी सक्रिय हैं।

गांधीजी से प्रभावित थे हाजी करामत उल्ला
हाजी करामत उल्ला पूर्व विधायक अशफाक अहमद के पिता, पूर्व विधायक व सपा नेता इस्लाम साबिर के दादा और भोजीपुरा विधायक शहजिल इस्लाम के परदादा हैं। हाजी करामत उल्ला के पोते और पूर्व विधायक इस्लाम साबिर बताते हैं कि दादा हाजी करामत उल्ला आजादी से पहले भी राजनीतिक तौर पर सक्रिय थे। उस दौर में डिविजनल पार्लियामेंट्री का चुनाव हुआ करता था। जिसमें करामत उल्ला ने भाग लिया। वह महात्मा गांधी के विचारों से बेहद प्रभावित थे।

उन्होंने जिन्ना की मुस्लिम लीग के खिलाफ चुनाव लड़ा। वह 1942 में महात्मा गांधी के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन के साथ जुड़े और बरेली में आंदोलन को हवा देने का काम किया। 15 अगस्त 1947 को जब हिंदुस्तान आजाद हुआ तो पुराने लोग बताते हैं कि उनके चेहरे पर खुशी तो थी साथ ही इस बात गम भी था कि देश दो भागों में बंट गया। वह खुद भी पाकिस्तान नहीं गए और बरेली से जो लोग पाकिस्तान पलायन कर रहे थे, उनको भी जाने से रोका।

उनके बेटे अशफाक अहमद कांग्रेस से चुनाव लड़कर 1969, 1977, 1980 और 1996 में लगातार चार बार विधायक बने। इस्लाम साबिर 1991 में पहली बार कांग्रेस से चुनाव लड़कर विधायक बने। इसके बाद 2002, 2007, 2012 और 2022 में इस्लाम साबिर के बेटे शहजिल इस्लाम विधायक बने।

हमारे दादा हाजी करामत उल्ला महात्मा गांधी के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़े रहे। लोगों ने उनसे कहा पर वह पाकिस्तान नहीं गए बल्कि लोगों को जाने से रोका। देश के विभाजन से वह खुश नहीं थे। शहजिल इस्लाम हमारे परिवार की चौथी पीढ़ी हैं, जो राजनीति में सक्रिय हैंइस्लाम साबिर,सपा नेता व पूर्व विधायक।

लोगों को पाकिस्तान जाने से रोक रहे थे अज्म बरेलवी
फुरकान अहमद खान अज्म बरेलवी यूं तो अपने दौर के चर्चित शायर रहे, लेकिन आजादी से पहले और बाद भी उनके राजनीतिक रसूक का इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है रिपब्लिकन पार्टी से लोकसभा का चुनाव लड़कर 1962 में उन्होंने कांग्रेस के जीत की हैट्रिक के सपने को चकनाचूर कर दिया। दौर-ए-गुजिश्ता ( लेखक सुधीर विद्यार्थी द्वारा संपादित ) में लेखक धर्मपाल गुप्त शलभ लिखते हैं कि विभाजन के वक्त जब बरेली के मुसलमान अपना घर, मकान और सामान बेचकर पाकिस्तान जा रहे थे, तब फुरकान भाई काफी विचलित थे।

वह जाने वालों से हाथ जोड़कर मिन्नत कर रहे थे कि वतन न छोड़ों। सक्रिय राजनीति के दौरान वह रिपब्लिकन पार्टी और इंडियन मुस्लिम लीग से जुड़े रहे। कामरेड साथियों के साथ जेल में काफी समय नजरबंद भी रहे। उनकी वसीयत थी कि उनके जनाजे को मुस्लिम लीग के झंडे से लपेटा जाए। 84 साल की उम्र में 2008 में उनके निधन के बाद मुस्लिम लीग के पुराने साथियों ने इस वसीयत को पूरा भी किया। फुरकान अहमद की वतन परस्ती का नमूना उनकी किताब जुर्रते फिक्र में देखने को मिलता है जिसमें वह लिखते हैं कि सबसे बढ़िया सबसे आला मेरा देश निराला, मेरे देश में गंगा जमना मेरे पास हिमाला।

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