मुरादाबाद : दरोगा की नौकरी छोड़ आंदोलन में शामिल हुए थे अहसान अली, अंग्रेजों के खिलाफ बजाया था बगावत का बिगुल
सलमान खान, अमृत विचार। आजादी की जंग में शहर के अहसान अली ने भी बड़ा योगदान दिया है। दरगाह शाह मुकम्मल साहब की दरगाह के सज्जादानशीन रहे सैय्यद अहसान अली ने पहले देशवासियों की मदद के लिए ब्रिटिश सरकार में दरोगा की नौकरी की। लेकिन, देशवासियों पर अंग्रेजों के अत्याचार के खिलाफ उन्होंने नौकरी छोड़ …
सलमान खान, अमृत विचार। आजादी की जंग में शहर के अहसान अली ने भी बड़ा योगदान दिया है। दरगाह शाह मुकम्मल साहब की दरगाह के सज्जादानशीन रहे सैय्यद अहसान अली ने पहले देशवासियों की मदद के लिए ब्रिटिश सरकार में दरोगा की नौकरी की। लेकिन, देशवासियों पर अंग्रेजों के अत्याचार के खिलाफ उन्होंने नौकरी छोड़ दी और आजादी की जंग में शामिल हो गए।
इसके बाद अंग्रेजी फौज ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्होंने 10 माह की जेल काटी। शहर की ईदगाह स्थित दरगाह हजरत शाह मुकम्मल दरगाह के सज्जादानशीन दरोगा अहसान अली देश सेवा के भाव से पुलिस में भर्ती हुए। बेहतरीन सेवाओं के चलते वह शहर के कोतवाल भी रहे। लेकिन, अंग्रेजों के बढ़ते अत्याचारों को देखकर उन्होंने 1905 में पुलिस की नौकरी छोड़ दी। इसके बाद वह मोतीलाल नेहरू, हकीम अजमल खां और महात्मा गांधी के सहयोग से आजादी के आंदोलन में शामिल हो गए। क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने के चलते अहसान अली एक बार रामगंगा नदी पार अंग्रेजों के खिलाफ तकरीर रहे थे। तभी उन्हें ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था।
इसके बाद वह छह मई 1921 से चार फरवरी 1922 तक मुरादाबाद की जेल में रहे। अंग्रेजी फौज ने उन पर बहुत जुल्म किए, लेकिन वह अंग्रेजों के खिलाफ नारे बुलंद करते रहे।
कोड़े मारने से पेट पर हो गए थे गहरे जख्म, 1953 में हुई मौत
मौजूदा समय में शाह मुकम्मल साहब की दरगाह सज्जादानशीन सैय्यद शिब्ली मियां, स्वतंत्रता सेनानी सैय्यद अहसान अली के पर पोते हैं। उन्होंने बताया कि अंग्रेजों ने जब अहसान अली को गिरफ्तार किया था तो उस समय गोरे उन्हें खेतों में पानी देने के लिए बैलों की जगह बांधते थे और उन पर कौड़े बरसाते थे। जिसके बाद उनके पेट पर गहरे जख्म हो गए थे। साल 1953 में उनकी मौत हो गई।
बंटवारे के समय नहीं गए थे पाकिस्तान
भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के समय सैय्यद अहसान अली के पिता व सभी भाइयों ने पाकिस्तान जाने का फैसला लिया था। लेकिन, देश से मोहब्बत के कारण अहसान अली ने पाकिस्तान जाने से साफ इंकार कर दिया था। उनका कहना था कि भारत ही मेरा असली वतन है और मैं यही की मिट्टी में दफन होना चाहता हूं। जिसके बाद उनके पिता व भाई उन्हें छोड़कर पाकिस्तान चले गए थे।
देश की मोहब्बत के लिए छोड़ दी थी जमीदारी
देश की आजादी में अपनी अहम भूमिका निभाने वाले सैय्यद अहसान अली मुरादाबाद के गांव उत्तमपुर-बहलौनपुर के बड़े जमीदार थे। लेकिन देश की मोहब्बत और देशवासियों की खिदमत के लिए उन्होंने अपनी जमीदारी छोड़ दी थी और ब्रिटिश पुलिस में भर्ती हो गए थे।
गोरों के खिलाफ दरगाह पर करते थे मीटिंग
सैय्यद अहसान अली उस दौर में दरगाह शाह मुकम्मल साहब पर ही सभी क्रांतिकारियों को जमा कर लेते थे। जिसके बाद दरगाह पर ही अंग्रेजों के खिलाफ मीटिंग कर आंदोलन की तैयारी होती थी।
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