राम मंदिर ट्रस्ट पर विवाद गलत

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Edited By Amrit Vichar
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केंद्र सरकार ने हाल ही में श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन की घोषणा की है। इस घोषणा के बाद से ही ट्रस्ट में शामिल करने को लेकर देश के भीतर हिंदूवादी संगठनों, धार्मिक व्यक्तियों और नेताओं में मांग उठने लगी है। यह मांग एक तरह से इस मामले को एक नए …

केंद्र सरकार ने हाल ही में श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन की घोषणा की है। इस घोषणा के बाद से ही ट्रस्ट में शामिल करने को लेकर देश के भीतर हिंदूवादी संगठनों, धार्मिक व्यक्तियों और नेताओं में मांग उठने लगी है। यह मांग एक तरह से इस मामले को एक नए विवाद में डालने जैसी है। सोच के स्तर पर लोगों के साथ समस्या यह है कि किसी भी बड़े मामले का पहले राजनीतिकरण करो, इसके बाद इसी राजनीति के कारण उस पर विवाद, फिर मामला इतना गंभीर हो जाता है कि उसे सुलझने में वर्षों लग जाते हैं। इतने पर भी जब समस्या के समाधान की तरफ एक नई कोशिश के साथ बढ़ा जाता है तो फिर कोई न कोई नई बाधा सामने होती है।

राम मंदिर विवाद के बाद ट्रस्ट गठन को लेकर भी यही हाल सामने आ रहा है। कई संत नजरअंदाज किए जाने की बात कर रहे हैं। उप्र के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने ट्रस्ट में उन्हें शामिल करने की मांग उठाई है तो उमा भारती ने उनकी बात का समर्थन कर दिया है। दोनों नेताओं को यह बात समझनी चाहिए कि एक निश्चित प्रक्रिया के तहत ट्रस्ट गठन की कार्यवाही आगे बढ़ रही है। ट्रस्ट में किसे शामिल करना है किसे नहीं यह अधिकार केंद्र का है और वह इस पर काम कर रहा है। ऐसे में बेवजह ट्रस्ट गठन को लेकर विवाद पैदा करने का कोई अर्थ नहीं है। इतने लंबे समय बाद मामले का हल निकला तो फिर इसमें जब बाधा की कोई गुंजाइश नहीं बची थी तो फिर उसे क्यों विवाद का विषय बनाया जा रहा है?

सर्वोच्च अदालत अगर इस मामले के समाधान के रूप में ट्रस्ट की जगह कोई और रास्ता बताती तो फिर क्या होता? अब जबकि ट्रस्ट गठन की घोषणा हो चुकी है तो उसमें शािमल करने की मांग कर आखिर क्या चाहते हैं? इसका मतलब तो यही हुआ कि वह मामले का बेवजह राजनीतिकरण करने पर तुले हुए हैं। यह मामला किसी भी जाति, संप्रदाय से ऊपर उठकर पूरे देश के लोगों की भावनाओं से जुड़ा है। लोग चाहते हैं कि राम मंदिर अस्तित्व में आए।

अव्वल तो यह कि ट्रस्ट गठन के बाद यही नेता उसमें पूरा सहयोग देने की बात कहते, वही इसे विवाद की तरफ ले जाकर लोगों की भावनाओं के साथ भी खेल रहे हैं। मामले में केंद्र सरकार को तटस्थ भूमिका निभाते हुए सभी की धार्मिक भावनाओं का ध्यान रख ट्रस्ट में अपने विवेक से लोगों को शामिल कराना चाहिए। उसे ऐसी बातों की अनदेखी करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के पालन करते हुए सही दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।