कंपनियों की मनमर्जी

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

‘इस देश में रहने से बेहतर है इसे छोड़कर चले जाना चाहिए’। सर्वोच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी शुक्रवार को 1.47 लाख करोड़ रुपए के एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (एजीआर) के मामले में सुनवाई के दौरान की। देश की सबसे बड़ी अदालत की अवमानना के बाद कोर्ट ने यह टिप्पणी की है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता …

‘इस देश में रहने से बेहतर है इसे छोड़कर चले जाना चाहिए’। सर्वोच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी शुक्रवार को 1.47 लाख करोड़ रुपए के एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (एजीआर) के मामले में सुनवाई के दौरान की। देश की सबसे बड़ी अदालत की अवमानना के बाद कोर्ट ने यह टिप्पणी की है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय टेलीकॉम कंपनियों और केंद्रीय टेलीकॉम विभाग के रवैये से कितना नाराज है और टेलीकॉम कंपनियों ने सर्वोच्च अदालत के फैसले को कितनी गंभीरता से लिया।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में टेलीकॉम कंपनियों से 23 जनवरी तक 1.47 लाख करोड़ रुपये जमा कराने को कहा था। टेलीकॉम कंपनियों पर एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू के आधार पर स्पेक्ट्रम और लाइसेंस फीस के रूप में यह रकम बकाया है, कंपनियों को यह भुगतान दूरसंचार विभाग को करना है। सुप्रीम कोर्ट ने 24 अक्टूबर को यह आदेश दिया था कि टेलीकॉम कंपनियां 23 जनवरी तक बकाया राशि जमा करें। लेकिन टेलीकॉम विभाग के एक डेस्क अफसर ने अगले आदेश तक इस रिकवरी पर रोक लगा दी थी। इसके बाद भारती एयरटेल, वोडाफोन-आइडिया और टाटा टेली ने भुगतान के लिए ज्यादा वक्त मांगते हुए नया शेड्यूल तय करने की अपील की थी।

शुक्रवार को जब उच्चतम न्यायालय में इस मामले की सुनवाई हुई तो न केवल कंपनियों की अपील खारिज कर दी गई बल्कि उनके खिलाफ अवमानना कार्रवाई के लिए भी न्यायालय ने कह दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जब हम पहले ही टेलीकॉम कंपनियों को भुगतान का आदेश दे चुके हैं, तब कोई डेस्क ऑफीसर ऐसा आदेश कैसे जारी कर सकता है? हमें नहीं पता कि कौन माहौल बिगाड़ रहा है? क्या देश में कोई कानून ही नहीं बचा है? कोई अधिकारी कोर्ट के आदेश के खिलाफ जुर्रत कर सकता है तो सुप्रीम कोर्ट को बंद कर देना चाहिए। कंपनियों ने एक पैसा भी नहीं चुकाया और आप सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर रोक चाहते हैं?

इस मामले में टेलीकॉम कंपनियों की इस मनमर्जी से समझा जा सकता है कि वह सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों को कितनी गंभीरता से ले रही हैं। लोकतंत्र में न्यायपालिका का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है और उसकी अवमानना बहुत गंभीर बात है। सर्वोच्च अदालत को इस मामले में कार्रवाई कर नजीर भी पेश करनी होगी ताकि भविष्य में न्यायपालिका की गरिमा को कोई ठेस नहीं पहुंचे। महत्वपूर्ण बात यह है कि न्यायालय ने इस मामले में बहुत कड़ा रुख अपनाते हुए टेलीकॉम कंपनियों के प्रबंध निदेशकों को कोर्ट में तलब कर लिया है। मामला चाहे सुप्रीम कोर्ट का हो या फिर किसी भी निचली अदालत का, कोर्ट का आदेश, आदेश है और उसकी अवहेलना किसी स्तर पर स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए।