बरेली: घर छोड़ा जिन सपनों के लिए उनको लाकडाउन ने तोड़ा
बरेली, अश्विनी शर्मा। सपने अधूरे रहे गए। अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए घर से निकले थे, लेकिन समय की ऐसी मार पड़ी कि फिर से ही घर आ गए। खरजाना अपने पति और तीन बच्चों के साथ भुता में रहती थीं। लेकिन कहीं काम करने जाती तो उससे मोहल्ले वाले प्रताड़ित करते। इसकी …
बरेली, अश्विनी शर्मा। सपने अधूरे रहे गए। अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए घर से निकले थे, लेकिन समय की ऐसी मार पड़ी कि फिर से ही घर आ गए। खरजाना अपने पति और तीन बच्चों के साथ भुता में रहती थीं। लेकिन कहीं काम करने जाती तो उससे मोहल्ले वाले प्रताड़ित करते। इसकी वजह से वह न अपने बच्चों को पढ़ा पा रही थीं और न ही घर की बाकी जरूरतों को पूरा कर पा रही थी।
खरजाना के पति फरियाद भुता में मजदूरी करते थे। फरियाद दिहाड़ी में 250 रुपये कमाकर घर आते थे। इससे सिर्फ घर का खर्चा चलता था, लेकिन घर की बाकी कई जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही थीं। खरजाना दर्जी का काम भी खूब अच्छे से जानती थीं। लेकिन जब वह घर के पड़ोस में दुकान पर काम करने जाती तो मोहल्ले वाले कई तरह की बातें करते थे। इस बात से परेशान खरजाना ने अपने पति से घर से दूर जाकर रुपये कमाने की बात कहीं थी। इस बात से राजी हुए पति ने राजस्थान जाने की सोच ली थी।
2018 में खरजाना अपने पति और बच्चों को लेकर राजस्थान के जयपुर चली गई थीं। राजस्थान में दर्जी का काम जानने वाली खरजाना को कपड़े सिलने का काम तो नहीं मिला लेकिन पति के साथ ईंट के भट्टे पर काम करने का मौका जरूर मिल गया। तीन बच्चे फैजल, शहजल, आयशा और अपने पति फरियाद के साथ अच्छी जिंदगी गुजर रही थीं। लेकिन लाकडाउन के बाद जिन सपनों के लिए घर छोड़ा था, वह अधूरे रह गए। परदेस में कोई भी अपना नहीं था, दो महीने बीत चुके थे, खरजाना के पास रखी जमापूंजी भी धीरे-धीरे खत्म होने लगी थीं। घर जाने के लिए जी मचल रहा था। तीन बच्चों के साथ करीब 500 किलोमीटर का सफर भी तय करना था। खरजाना सफर तय करने से पहले डर रही थी कि कहीं कोई बस या ट्रेन वाला किराया न ले।
लेकिन जैसे-तैसे जयपुर बस स्टैंड से बरेली जाने के लिए अपने सामान के साथ बस में बैठ गई। जिसके बाद आगरा से बरेली के लिए बस मिलनी थीं। घर जाने की जल्दी में आगरा की बस में ही घर के बर्तन, कपड़े, चूल्हा और जिस पोटली में बैटरी ऑफ होने के बाद फोन रख रखा था, वो छूट गया। जिस बस ने आगरा छोड़ा था वो बस भी अपनी दूसरी मंजिल की ओर निकल गई थीं। हताश खरजाना नखुश होकर भी बरेली जाने वाली बस में बैठ गई। घर जाने के लिए अब करीब 250 किलोमीटर का सफर तय करना था।
सफर में खरजाना ने मां होने का भी बखूबी फर्ज निभाया है। खरजाना बच्चों के लिए भोजन के पैकेट मांग लेती थीं और सफर में खुद तो भूखी रह लेती थीं, लेकिन बच्चों के लिए भूखा नहीं रहने देती थीं। ऐसे ही 250 किलोमीटर का सफर कट गया और खरजाना बरेली पहुंचकर बीसलपुर चौराहे पर भुता जाने वाली सवारी के इंतजार में बैठी रही।
