दोहरा रवैया
पूरी दुनिया में आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई छिड़ी हुई है लेकिन आतंकवाद के खतरों को लेकर चीन का दृष्टिकोण साफ़ नहीं है। संयुक्त राष्ट्र में भारत ने आतंकवाद से लड़ने के मुद्दे पर चीन पर निशाना साधते हुए दोहरे मापदंड अपनाने को लेकर आगाह किया और कहा कि यथास्थिति बदलने की कोशिश करने वाली कोई …
पूरी दुनिया में आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई छिड़ी हुई है लेकिन आतंकवाद के खतरों को लेकर चीन का दृष्टिकोण साफ़ नहीं है। संयुक्त राष्ट्र में भारत ने आतंकवाद से लड़ने के मुद्दे पर चीन पर निशाना साधते हुए दोहरे मापदंड अपनाने को लेकर आगाह किया और कहा कि यथास्थिति बदलने की कोशिश करने वाली कोई भी कार्रवाई साझा सुरक्षा के सिद्धांत का उल्लंघन है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की यह बैठक चीन की ओर से बुलाई गई थी, जो अगस्त के लिए सुरक्षा परिषद का अध्यक्ष है और 15 सदस्यीय परिषद में उसके पास वीटो का अधिकार है। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने हितों की रक्षा के लिए चीन का दृष्टिकोण लगातार विस्तारवादी है। इसलिए आतंकवाद से निपटने को लेकर चीन की सोच धुंधली बनी हुई है। इस मामले में चीन की कथनी और करनी का अंतर साफ नजर आता है।
एक तरफ चीन आतंकवाद को जड़-मूल से उखाड़ऩे की घोषणा करता रहता है, दूसरी तरफ आतंकवादियों की पीठ थप-थपाता रहता है। चीन ने अपने रवैये से समय-समय पर साबित किया है कि वह सिर्फ पाकिस्तान का ही दोस्त नहीं है बल्कि वहां पलने वाले आतंकवादियों का भी मददगार है। पिछले दिनों पाकिस्तान के आतंकी अब्दुल रऊफ असगर पर प्रतिबंध लगाने और उसे वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के लिए भारत और अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव पेश किया था लेकिन अकेले चीन ने इसका विरोध करते हुए रोक लगा दी।
इससे पहले जून में भी चीन ने प्रतिबंध सूची में लश्कर-ए-तैयबा के उप प्रमुख अब्दुल रहमान मक्की को सूचीबद्ध करने के भारत और अमेरिका के संयुक्त प्रस्ताव को रोक दिया था। मक्की साल 2008 में हुए मुंबई आतंकी हमलों में शामिल रहा है। मसूद अजहर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकी घोषित करने के प्रस्ताव को भी चीन ने दस साल तक लटकाए रखा था। सवाल है कि चीन आतंकियों को क्यों बचा रहा है और ऐसा करके वह भारत-अमेरिका समेत बाकी दुनिया को आखिर क्या संदेश देना चाहता है?
दरअसल, भारत और पाकिस्तान से जुड़े मसलों में चीन अक्सर आंख मूंदकर पाकिस्तान की पैरवी करता रहा है। विश्लेषक मानते हैं कि चीन ये प्रस्ताव रोककर भारत से बदला लेने की कार्रवाई करता है। इससे चीन को बस यही फायदा है कि ये आतंकवादी भारत को नुकसान पहुंचाते हैं। यानी भारत का नुकसान ही चीन का फायदा है। कहा जा सकता है कि चीन आतंकवाद पर भारत ही नहीं बल्कि दुनिया की आवाज भी नहीं सुन रहा। वह पाकिस्तान के आतंकवाद के समर्थन के रुख पर दोहरा मानदंड अपना रहा है। चीन की यह सोच उसके लिए घातक सिद्ध हो सकती है।
