लाकडाउन ने तोड़ दी कमर, जेवर गिरवी रखने को हुए मजबूर
महिपाल गंगवार/अविक सिंह, बरेली/मुरादाबाद। लाकडाउन में सबने मजदूरों से लेकर उद्यमियों तक की बात की। सरकार से लेकर अधिकारी, समाजसेवी सबके दिलो दिमाग में भूखे-प्यासे मजदूर रहे। उन्हें खाना दिया गया, प्रवासी मजदूरों को तो एक-एक हजार रुपये व महीने भर का राशन दिया गया। फैक्ट्री व उद्योग धंधे चलाने के लिए सरकार ने खास …
महिपाल गंगवार/अविक सिंह, बरेली/मुरादाबाद। लाकडाउन में सबने मजदूरों से लेकर उद्यमियों तक की बात की। सरकार से लेकर अधिकारी, समाजसेवी सबके दिलो दिमाग में भूखे-प्यासे मजदूर रहे। उन्हें खाना दिया गया, प्रवासी मजदूरों को तो एक-एक हजार रुपये व महीने भर का राशन दिया गया।
फैक्ट्री व उद्योग धंधे चलाने के लिए सरकार ने खास रणनीति बनाई, तमाम सुविधाएं दी। लेकिन इन सबके बीच में एक वर्ग ऐसा भी था जो अंदर ही अंदर घुट रहा था। उसका दर्द किसी ने महसूस नहीं किया। सरकार से लेकर प्रशासन, समाजसेवी किसी ने उस तक पहुंचने की कोशिश नहीं की। हम बात कर रहे हैं मध्यमवर्ग की।
शहर में तमाम ऐसे परिवार हैं जिनका रोजगार छिन गया। घर में खाने के लाले पड़ गए। लेकिन इज्जत की खातिर किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। अब जब बाजार खुला तो भी रोजगार की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही। चूंकि जिंदा रहना है, बच्चों को रोटी खिलानी है लिहाजा मजबूरी में पत्नियों के जेवर गिरवी रखने बाजार पहुंच गए। सर्राफा बाजार में इन दिनों ऐसे ही मध्यमवर्गीय परिवारों की भीड़ उमड़ रही है। यह जेवर खरीदने नहीं जेवर गिरवी रखने सर्राफा बाजार पहुंच रहे हैं। इस उम्मीद के साथ कि भविष्य में जब कभी अच्छे दिन आएंगे तो जेवर को छुड़वा लेंगे।
मुरादाबाद में भी मध्यमवर्गीय परिवार का यही हाल है। बच्चे भूख से बिलबिलाते हैं तो मां-बाप बेचैन हो जाते हैं। खाने के पैकेट लेने को लाइन में लग नहीं सकते। बच्चों की फीस और मकान के कर्ज के किश्त भरनी है, परिवार का पेट भी पालना है। मजबूरी में लोग जेवर गिरवी रख रहे हैं। साहूकारों की बात मानें तो पिछले एक सप्ताह में जेवर के बदले कर्ज लेने वाले 100 से ज्यादा लोग आ चुके हैं। ये सभी मध्यमवर्गीय परिवार के हैं। बैंकों में भी गोल्ड लोन लेने वालों का आंकड़ा बड़ा है। इतना ही नहीं जिन लोगों ने पहले से ही गोल्ड लोन ले रखा था, उनमें से अधिकांश ने लोन को रिन्यू करा लिया है।
लाकडाउन में इस वक्त आर्थिक रूप से कमजोर लोग खासे परेशान हैं। नौकरी छूटने से लोग बेरोजगार हो गए हैं। कोई नया काम धंधा मिल नहीं रहा। मजबूरी में लोग आभूषण बेचने आ रहे हैं। लाकडाउन के बाद अब बाजार खुलने पर लोग जेवर बेचने ज्यादा आ रहे हैं। -विनोद वर्मा, सर्राफा
बाजार खुलने के बाद अब मध्यमवर्गीय परिवार का दुख समझ आ रहा है। तमाम ऐसे लोग आभूषण गिरवी रखने आ रहे हैं जिनकी नौकरी छूट चुकी है या उनके पास कमाने या खाने का कोई रास्ता नहीं है। मजबूरी में लोगों को जेवर गिरवी रखना पड़ रहा है। -शीतेश अग्रवाल, सर्राफ
अनलाक-1 में जेवर गिरवी रखने वालों की संख्या में इजाफा हुआ है। यह सभी मध्यमवर्गीय परिवार के हैं। ये अपनी पहचान उजागर करने से साफ इनकार करते हैं। अब तक पांच-छह लोगों मेरे यहां ही जेवर गिरवी रख चुके हैं। -सचिन अग्रवाल, सर्राफ, मुरादाबाद
बाजार खुलते ही करीब 50 लोग आ चुके हैं। इनके जेवर गिरवी रखकर रुपये दिए गए हैं। सभी मध्यमवर्गीय परिवार के हैं। कुछ लोग ऐसे भी थे जिनके गिरवी जेवरों पर देनदारी बहुत कम बची थी। लेकिन ये लोग दोबारा से जेवरों पर रुपये ले गए। -श्रवण कुमार, सर्राफ, मुरादाबाद
