स्मृति शेष: बाराबंकी से रहे मुलायम के करीबी रिश्ते, रामसेवक से सीखा था राजनीति का ककहरा, शिखर तक पहुंचाने में बेनी ने निभाई थी अहम भूमिका
सतीश श्रीवास्तव, अमृत विचार, बाराबंकी। रामसेवक यादव, मुलायम सिंह यादव और बेनी प्रसाद वर्मा (तीनों के स्मृति शेष) समाजवादी राजनीति के पुरोधा माने जाते हैं। राम सेवक यादव को अगर मुलायम सिंह को राजनीति में लाने का श्रेय है तो बेनी प्रसाद वर्मा को उन्हें शिखर तक पहुंचाने का। यह स्थिति ही मुलायम सिंह यादव को …
सतीश श्रीवास्तव, अमृत विचार, बाराबंकी। रामसेवक यादव, मुलायम सिंह यादव और बेनी प्रसाद वर्मा (तीनों के स्मृति शेष) समाजवादी राजनीति के पुरोधा माने जाते हैं। राम सेवक यादव को अगर मुलायम सिंह को राजनीति में लाने का श्रेय है तो बेनी प्रसाद वर्मा को उन्हें शिखर तक पहुंचाने का। यह स्थिति ही मुलायम सिंह यादव को बाराबंकी से हमेशा जोड़ती रही। राजनीति का ककहरा भी उन्होंने रामसेवक यादव से ही सीखा। उनकी प्रतिभा को पहचानकर रामसेवक यादव ने उन्हें समाजवादी युवजन सभा की कमान सौंपी थी।
पूर्व केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा उनके करीबी दोस्तों में शुमार किए जाते थे। दोनों ने मिलकर समाजवादी पार्टी की नींव रखी थी। दोस्ती इतनी प्रगाढ़ थी कि बेनी प्रसाद वर्मा ने मुलायम सिंह यादव के लिए मुख्यमंत्री का पद ठुकरा दिया था। तो मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री रहते हुए भी जब भी बेनी प्रसाद वर्मा नाराज हो जाते थे उनके घर जाते थे। यह बात अभी ज्यादा दिन पुरानी नहीं है। जब बेनी प्रसाद वर्मा मुलायम सिंह से बहराइच के पूर्व मंत्री को लेकर नाराज हो गए थे। ऐसा लग रहा था कि दोनों के रास्ते आप अलग अलग होंगे।

लेकिन मुलायम सिंह यादव बेनी प्रसाद वर्मा को मनाने के लिए उनके घर सिरौलीगौसपुर पहुंच गए। हेलीकॉप्टर के पर अभी थमा भी नहीं थे कि बेनी प्रसाद वर्मा को देखते ही मुलायम सिंह यादव हेलीकॉप्टर से कूद पड़े। दोनों मिले तो दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे। हालांकि इसके बाद भी बेनी प्रसाद वर्मा की नाराजगी दूर नहीं हुई और बाद में वह कांग्रेस में शामिल हो गए। लेकिन जैसे ही कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई बेनी प्रसाद वर्मा को मुलायम सिंह ने पुनः बुलाकर राज्यसभा में भेज दिया।
मुलायम सिंह यादव को वैचारिक, मानसिक दृढ़ता और कुशल संगठन क्षमता रामसेवक यादव से ही मिली थी। जब तक राम सेवक यादव जीवित रहे मुलायम सिंह हमेशा उनका मार्गदर्शन प्राप्त करते रहें। रामसेवक यादव के बाद उन्होंने उनके भाई प्रदीप यादव को राजनीति में आगे बढ़ाया उन्हें अपने मंत्रिमंडल में साथ रखा। बाद में उनके भतीजे को एमएलसी बनाया।
इसी दौरान मुलायम सिंह यादव ने लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष रहे अरविंद सिंह गोप को आगे बढ़ाया। गोप हैदरगढ़ विधानसभा क्षेत्र से जीतकर विधानसभा पहुंचे तो उन्हें मंत्री मनाया गया बाद में अखिलेश सरकार में भी गोप कैबिनेट मंत्री रहे। गोप हमेशा कहते रहे हैं कि मित्र और नेता जीवन में एक ही बार चुना जाता है। नेता जी को नेता मान लिया तो मान लिया।

मुसीबत में खड़े रहते थे अपनों के साथ
मुलायम सिंह यादव की एक खासियत यह भी थी कि मुसीबत के समय वह अपने साथियों को नहीं भूलते थे। मुझे याद है कि जब बाराबंकी में जिला पंचायत चुनाव के दौरान पूर्व विधायक हरदेव रावत की हत्या हुई थी। मुलायम सिंह यादव समय मुख्यमंत्री थे। उनके गोली लगने के बाद बेनी प्रसाद वर्मा जिले भर के कार्यकर्ताओं के साथ जिला अस्पताल में खड़े थे।
पास ही कैबिनेट मंत्री गोपी मौजूद थे। बेनी प्रसाद वर्मा गोप से बोले कि मुख्यमंत्री से बात कराओ। गोप ने तुरंत फोन लगाया। दोनों लोग आपस में कुछ देर बात करते रहें इसके बाद बेनी ने फोन एसपी को थमाया। मुख्यमंत्री से बात करने के बाद एसपी ने कहा जा रहा हूं छापा मारने। इसके बाद की कहानी किसी से छिपी नहीं है।
फूट-फूट कर रोए गोप
मुलायम सिंह यादव के निधन का समाचार मिलते ही उनके करीबी लोगों में शुमार किए जाते रहे पूर्व मंत्री अरविंद सिंह गोप फूट फूट कर रो पड़े। घंटों उनके आंखों से अश्रु धारा बहती रही। बोले मुलायम सिंह यादव को कार्यकर्ताओं की पहचान थी। उन्होंने मेरे जैसे हजारों नौजवानों को आगे बढ़ाया। विधायक बनाया, मंत्री बनाया। उनके रहते हैं कभी कार्यकर्ताओं ने अपने आप को असहाय नहीं समझा। कार्यकर्ता समझता था कि नेताजी हैं इसलिए उन्हें कोई डिगा नहीं सकता।
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