बरेली: लद्दाख में तैनात जवानों को ठंड से बचाएगा गिनी फाउल व टर्की का मीट
सिद्धार्थ भारद्वाज, बरेली। हर वक्त ठंड की चादर ओढ़े रहने वाले व कम आक्सीजन के क्षेत्र लद्दाख में तैनात जवानों को ठंड से बचाने के लिए केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान (सीएआरआई) इज्जतनगर के वैज्ञानिक पक्षियों की दो प्रजातियों पर शोध कर रहे हैं। शोध कार्य पूरा होने के बाद रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के …
सिद्धार्थ भारद्वाज, बरेली। हर वक्त ठंड की चादर ओढ़े रहने वाले व कम आक्सीजन के क्षेत्र लद्दाख में तैनात जवानों को ठंड से बचाने के लिए केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान (सीएआरआई) इज्जतनगर के वैज्ञानिक पक्षियों की दो प्रजातियों पर शोध कर रहे हैं। शोध कार्य पूरा होने के बाद रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के सहयोग से जवानों को गिनी फाउल व टर्की का मीट लद्दाख में ही उपलब्ध कराया जाएगा। ठंडे मौसम में यह मीट खाने से जवानों के तापमान में गिरावट नहीं आएगी।
सितंबर माह से दोनों प्रजातियों को विकसित करने के महत्वपूर्ण कार्य पर शोध शुरू करने की तैयारी चल रही है। केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक जल्द ही दोनों नई प्रजातियां विकसित करने का दावा कर रहे हैं। बताते हैं कि गिनी फाउल व टर्की करीब 12 हजार फीट की ऊंचाई पर कम आक्सीजन में आसानी से पाले जा सकते हैं। वैज्ञानिक गिनी फाउल की पर्ल प्रजाति पर शोध शुरू करने की पूरी तैयारी में हैं।
गिनी फाउल में क्या है खास
सीएआरआई के वैज्ञानिकों के अनुसार गिनी फाउल अन्य कुक्कुट प्रजातियों के मुकाबले खुद को किसी भी मौसम में अनुकूलित कर लेती है। मुक्तेश्वर में सात हजार फीट ऊंचाई पर अनुकूलित कर चुकी है। इसमें गिनी फाउल की पर्ल प्रजाति से दो और प्रजातियां लेवंडर एवं वाइट विकसित की जा चुकी हैं। सबसे खास बात यह है कि टर्की मीट में कोलेस्ट्राल कम होता है। इसका अंडा भूरे रंग का होता है।
कम आक्सीजन पर जिंदा रही गिनी फाउल
आक्सीजन की मात्रा कम होने से लद्दाख क्षेत्र में कुक्कुट प्रजातियां जिंदा नहीं रह पाती थीं। ऐसे में यहां तैनात जवानों को गिनी फाउल का मीट भेजा जाता था। इसमें छह से सात दिन लग जाता है। इसको देखते हुए कुछ समय पहले रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के पदाधिकारी गिनी फाउल को पालने के लिए लद्दाख ले गए थे। कम आक्सीजन में भी गिनी फाउल जिंदा रही।
“लद्दाख में तैनात जवानों को गिनी फाउल और टर्की के ताजा मीट उपलब्ध कराने के लिए सितम्बर माह से शोध कार्य शुरू हो जाएगा। इसके लिए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन से मदद ली जाएगी।” -डा संजीव कुमार, कार्यवाहक निदेशक, सीएआरआई
