दिल्ली में लॉकडाउन के दौरान 70 फीसदी घटा नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का स्तर

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नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान राजधानी दिल्ली में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का स्तर 70 फीसदी से अधिक घटा है। हवा में नाइट्रोजन डाइ ऑक्साइड की अधिकता से श्वसन संबंधी कई समस्यायें उत्पन्न होती हैं और इस वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत वाहन होते हैं। संयुक्त राष्ट्र की ‘शहरी दुनिया में …

नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान राजधानी दिल्ली में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का स्तर 70 फीसदी से अधिक घटा है। हवा में नाइट्रोजन डाइ ऑक्साइड की अधिकता से श्वसन संबंधी कई समस्यायें उत्पन्न होती हैं और इस वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत वाहन होते हैं।

संयुक्त राष्ट्र की ‘शहरी दुनिया में कोविड-19′ की मंगलवार को जारी रिपोर्ट के अनुसार, लॉकडाउन के दौरान वाहनों के आवागमन पर लगी रोक वायु प्रदूषण को कम करने में कारगर साबित हुई लेकिन शहरों को बिना किसी नीति के दोबारा खोला गया तो यह उपलब्धि क्षणिक साबित हो सकती है।

लॉकडाउन के कारण ग्रीनहाउस गैस उर्त्सजन और प्रदूषण में आयी कमी को स्थायी रखने के लिए शहरों को दोबारा खोलने से पहले प्रदूषण कम करने की नीति को लाूग करना चाहिए तथा कार्बन उर्त्सजन को कम करने को बढावा देना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक काेरोना महामारी का केंद्र शहरी क्षेत्र हैं। शहरी इलाकों में कोरोना संक्रमण के 90 फीसदी मामले हैं। कईं अध्ययनों से यह बात सामने आयी है कि हवा की खराब गुणवत्ता कोरोना संक्रमण के कारण होने वाली मौत का परस्पर संबंध हैं। नाइट्रोजन ऑक्साइड का स्तर बढ़ने से अमेरिका में मृत्युदर में आठ प्रतिशत तथा नीदरलैंड में 21.4 प्रतिशत तक की बढ़त दर्ज की गयी है। शहरी आबादी के घनत्व तथा आवागमन के सभी रास्तों से वायरस के संक्रमण का प्रसार होता है।

रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में नाइट्रोजन डाइ ऑक्साइड का स्तर 70 फीसदी से अधिक कम हुआ जबकि अमेरिका के विभिन्न शहरों में यह 18 से 40 प्रतिशत तक, जर्मनी तथा बेल्जियम में 20 प्रतिशत तथा चीन के शहरी इलाकों में 40 फीसदी घटा है। हवा में नाइट्रोजन डाइ ऑक्साइड की अधिकता से श्वसन संबंधी कई समस्यायें उत्पन्न होती हैं और इस वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत वाहन होते हैं।

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुटेरेस ने रिपोर्ट के लांच के मौके पर जारी अपने रिकॉर्डेड संदेश में कहा कि समय आ गया है कि हम इस वास्तविकता को समझ लें और शहरों को ज्यादा समावेशी, सतत तथा प्रतिरोध क्षमता पूर्ण बनायें। संरा की रिपोर्ट में मुम्बई का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि अप्रैल तक वहां चिह्नित कंटेनमेंट जोन में 30 प्रतिशत हिस्सा झुग्गी बस्ती का था और 60 प्रतिशत हिस्सा झुग्गी के आसपास के इलाकों का था।

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