वैश्विक एकजुटता जरूरी

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
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यह बात कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि आतंकवाद लंबे समय से वैश्विक समस्या बना हुआ है। न केवल भारत बल्कि अन्य देश भी आतंकवाद की समस्या से जूझ रहे हैं। भारत समय-समय पर विश्व को आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने की बात दोहराता रहा है। मंगलवार को पांच देशों की एक बैठक में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने ‘टेरर फंडिंग’ को आतंकवाद का आधार बताकर यही संदेश दिया कि इस मुद्दे को लेकर भारत बहुत गंभीर है।

हाल ही में जी-20 देशों के सम्मेलन में भी आतंकवाद का मुद्दा उठा था और लगभग सभी देशों ने इसके खिलाफ एकजुटता का संकल्प लिया। यह अच्छी बात है कि सभी देश अपना ध्यान मानवता के शत्रु आतंकवाद की ओर ले गए जिससे अब शायद ही कोई देश अछूता हो। लेकिन इतने भर से संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता।

आतंकवाद की जड़ें उखाड़ फेंकने के लिए जो प्रयास संयुक्त राष्ट्र समेत अन्य अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर एक साथ होना चाहिए, उसका अभाव है। जी-20 का चीन भी सदस्य है लेकिन आतंकवाद खासकर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के प्रति उसके रुख से शायद ही कोई सहमत हो। यह सहमति इसलिए भी नकारात्मक है कि आतंकवादियों के खिलाफ कोई प्रस्ताव आता है तो चीन उनके समर्थन में खड़ा हो जाता है।

सबसे बड़ी बात यह है कि अभी तक आतंकवाद को परिभाषित ही नहीं किया जा सका जिसके चलते कोई प्रभावी एजेंडा सामने नहीं लाया जा सका। ‘टेरर फंडिंग’ का जो मुद्दा डोभाल ने उठाया, उसकी तफ्तीश की जाए तो कई ऐसे देश सामने आएंगे। जो अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर तो आतंकवाद की मुखालफत करते हैं लेकिन व्यवहारिक रूप से अपने देश से होने वाली टेरर फंडिग को जानते-बूझते भी रोकने का प्रयास नहीं करते।

इस पर भी विद्रूप यह कि यही देश आतंकवाद के खिलाफ की जाने वाली कार्यवाही को मानवाधिकार से जोड़ कर भारत को ही कठघरे में खड़ा करने का दुष्प्रयास करते हैं। 
आतंकवाद भस्मासुर का रूप ले चुका है।

पाकिस्तान में होने वाले आतंकी हमले और तालिबानी अफगानिस्तान में आतंकवादियों द्वारा स्कूलों पर किए जा रहे हमले इस बात का सबूत हैं कि आतंकवाद किसी को नहीं बख्शता और न ही सौहार्द या शांति में उसका विश्वास है।

कुल मिलाकर यह समीचीन होगा कि आतंकवाद और उसे संजीवनी देने वाली ‘टेरर फंडिग’ तभी बंद होंगे, जब सभी देश इसके खिलाफ समर्पण भाव से खड़े होंगे। अन्यथा आतंकवाद के खिलाफ लड़ने का दिखावा जो देश कर रहे हैं। उनको इसका खामियाजा चुकाना पड़ सकता है।