बरेली: 1971 में पाक से युद्ध में देश के वीरों ने रची थी विजय की अमिट गाथा

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प्रशांत पांडेय, बरेली, अमृत विचार। 16 दिसंबर 1971 को भारतीय सेना ने पाकिस्तान को युद्ध में परास्त कर विजय की अमिट गाथा रची थी। आज के ही दिन देश के जवानों ने युद्ध में न केवल पाक को बुरी तरह हराया बल्कि उसकी सीमा के 80 किलोमीटर अंदर तक घुस गए थे।

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इस ऐतिहासिक युद्ध में सेना के हर कोर के वीरों ने अपने अदम्य साहस का परिचय दिया था। पूरे देश में इस दिन को विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। युद्ध में अनेक वीर जवानों ने अपनी जान की परवाह किए बगैर सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। पूरा देश सेना के पराक्रमी योद्धाओं को याद कर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा है।

1971 में पाकिस्तान से युद्ध के दिनों को याद कर गौरव सेनानी राकेश विद्यार्थी बताते हैं कि उन दिनों वह अगरतला बार्डर पर बतौर कारपोरल तैनात थे। हालांकि, इससे पहले भी पाकिस्तान कई बार सीज फायर करता रहा, उसके बाद छद्म युद्ध पर आमादा था। अक्टूबर के लगभग मध्य माह में युद्ध की घोषणा हुई। इस जीत के पीछे हमारे सेना के अधिकारियों की रणनीति बहुत कारगर रही।

तब रेडियो रिसीवर यंत्र से आसपास में दुश्मन सेना की बातचीत बमुश्किल से कैच कर उनकी रणनीति का पता लगाया जाता था। उन्हीं दिनों पाकिस्तानी सेना का सबसे बड़ा हितैषी रहे अमेरिका ने भी अपने विध्वंसक पोतों का बेड़ा बंगाल की खाड़ी में तैनात कर दिया था, लेकिन हमारी वायुसेना और जल सेना ने अपने अदम्य साहस और रणनीति का परिचय देते हुए दुश्मन पोतों को भी ध्वस्त कर दिया। देश की सेना ने युद्ध जीत कर पाकिस्तान के लाहौर तक तिरंगा फहराया।

1960 में सेना में बतौर ड्राइवर भर्ती हुए गौरव सेनानी बीडी शर्मा बताते हैं कि उनकी पहली पोस्टिंग आगरा में 17 पैरा में हुई थी। इसके एक साल बाद ही 1962 में चाइना के साथ अरुणाचल प्रदेश के मीसामढ़ी बार्डर पर युद्ध शुरू हो गया। तब दुर्भाग्यवश संसाधनों की कमी की वजह से हार का सामना करना पड़ा था। 

इसके बाद 1965 में अखनूर सेक्टर में पोस्टिंग के तुरंत बाद पाकिस्तान के साथ युद्ध शुरू हो गया। तब पाकिस्तान को बहुत बुरी तरह से भारतीय सेना ने परास्त किया। 1971 में सीज फायर कर युद्ध की शुरुआत कर दी। तब राजस्थान के बाड़मेर बार्डर पर बतौर नायब सूबेदार पद पर तैनाती थी। युद्ध में कई सेना के जवानों ने बलिदान दिया। गौरवशाली जीत हासिल हुई। हमारी सेना ने पाकिस्तान में 80 किमी भीतर गाजी कैंप तक पहुंचकर कब्जा कर लिया और भारतीय ध्वजा फहराया ।

1971 के युद्ध में भाग ले चुके जोगी नवादा निवासी हवलदार रामेश्वर दयाल रघुवंशी बताते हैं कि यह लड़ाई अचानक नहीं बल्कि 1969 से ही चल रही थी, लेकिन धीरे- धीर 1971 तक पाकिस्तान की ओर से लड़ाई तेज कर दी गई। 16 दिसंबर तक युद्ध समाप्त हो गया था। इसके अगले दिन हमारी सेना बांग्लादेश की सीमा में घुस चुकी थी।

वहां के रंगमति अस्पताल में हैलिकॉप्टर से पहुंचे थे, लेकिन वहां के लोग सेना को समझ नहीं पा रहे थे कि हम उनकी मदद के लिए वहां पहुंचे हैं और वे लगातार विरोध कर रहे थे। आखिरकार उन्हें समझाया गया। स्थित यह थी कि पाकिस्तानी सेना वहां के लोगों को प्रताड़ित कर चुकी थी। लोगों के पास खाने को राशन तक नहीं था। देश की सेना ने मदद की और उनका हॉस्पिटल में उपचार कराया।

मुख्य रूप से उत्तराखंड के सोमेश्वर के रहने वाले वर्तमान में संजय नगर रोड निवासी जीएस मेहरा उन दिनों पश्चिम बंगाल के बागडोगरा में बतौर ऑपरेटर तैनात थे। युद्ध के दिनों को याद कर बताते हैं कि 1971 में जाडे़ के दिनों में वहां के कमला टी गार्डन में भेज दिया गया था। वहां से सीमा की दूरी काफी कम है। एक्शन टाइम पर वहां के पाचागढ़ बार्डर पर जल्दी सेना पहुंच जाए, इसलिए टी-गार्डन में रखा गया था।

यहां आदेश मिलते ही नवंबर में उसी रात सीमा पर पहुंचे और सुबह करीब 4 बजे अटैक शुरू हो गया। इसके बाद हमारे सभी पीटी टैंकों ने पाचागढ़ सीमा को पूरी तरह से घेर लिया। यहां बड़ी संख्या में दुश्मन ऊपर की ओर छिपे हुए थे। यहां भी युद्ध कर विजय प्राप्त की। यहीं दुश्मन सेना के जवानों को गिरफ्तार कर उनकी बेल्ट, बैज, आदि निशानों को जब्त कर लिया गया था।

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