विकास की राह पर

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Edited By Amrit Vichar
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पिछले कुछ वर्षों में पूर्वोत्तर राज्यों में शांति और स्थिरता में लगातार सुधार देखने को मिला है। जबकि भौगोलिक कठिनाइयों की वजह से इस क्षेत्र का समुचित विकास कठिन कार्य रहा है। सरकार द्वारा घोषित परियोजनाओं का समयबद्ध तरीके से क्रियान्वयन न होना क्षेत्र के विकास की प्रमुख बाधाओं में से एक है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को कहा कि उनकी सरकार ने आठ साल के कार्यकाल में पूर्वोत्तर के विकास की राह में आई सभी बाधाओं को दूर कर दिया है। पूर्वोत्तर परिषद के स्वर्ण जयंती समारोह में पीएम मोदी ने कहा कि हम पूर्वोत्तर में ‘विवादों के बॉर्डर’ नहीं, विकास के कॉरिडोर बना रहे हैं।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि यहां विद्रोह की घटनाओं, सुरक्षाबलों पर हमले की घटनाओं और नागरिकों की मौत में कमी आई है। वहीं लगभग आठ हजार युवा आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में शामिल हुए हैं। निश्चित रूप से यह बहुत बड़ी उपलब्धि है क्योंकि शांति के बिना विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य के संस्थान आना संभव नहीं है।

क्षेत्र में शांति को बढ़ावा मिला है इस क्षेत्र में निवेश की संभावनाएं भी बढ़ी हैं। गौरतलब है कि पूर्वोत्तर राज्यों का क्षेत्रफल देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का आठ प्रतिशत है। पूर्वोत्तर की 98 प्रतिशत सीमा भारत की अंतर्राष्ट्रीय सीमा बनाती है। राजनीतिक अस्थिरता और आवश्यक संसाधनों के अभाव में पूर्वोत्तर राज्यों में निजी क्षेत्र के निवेश की भारी कमी रही है।

पूर्वोत्तर में अपार प्राकृतिक संसाधन हैं, साथ ही यहां खनिज तेल और गैस के भंडार तथा नदियों का मज़बूत तंत्र है जो ऊर्जा की दृष्टि से इसे अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है। सरकार ने एक्ट ईस्ट की नीति के तहत यहां विकास पर विशेष बल दिया। पूर्वोत्तर के विकास के लिए बाधाओं को चिह्नित करने, आयामों का खाका खींच कर संसाधनों का कारगर उपयोग करने तथा नए सिरे से लक्ष्य तय करने की आवश्यकता है।

वर्तमान में क्षेत्र की युवा पीढ़ी की जागरुकता, शिक्षा स्तर और देश के अन्य हिस्सों से उनका संपर्क बेहतर हुआ है। ऐसे में युवा पीढ़ी को विकास के अवसर उपलब्ध करा कर क्षेत्र की स्थिरता और विकास को सुनिश्चित किया जा सकता है। पूर्वोत्तर के समुचित विकास के लिए इस क्षेत्र की प्राकृतिक और ऐतिहासिक संरचना का अध्ययन बहुत ही आवश्यक होगा।

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देने की पहल के प्रारंभिक चरण के तहत बांग्लादेश, भूटान, भारत और नेपाल (बीबीआईएन) उप समूह के तंत्र को मज़बूत किया जाना चाहिए जिसे आगे चलकर क्षेत्र के अन्य देशों तक बढ़ाया जा सकता है।