बट्टे खाते में रकम
बट्टे खाते में गई बैंकों की रकम एक बार फिर चर्चा में आ गई है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को लोकसभा में कहा कि पांच साल में 10 लाख करोड़ रुपये का कर्ज बट्टे खाते में डाला गया। अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की इन ऋणधारकों से वसूली की प्रक्रिया जारी है। रिजर्व बैंक के नियमों के तहत बैंकों ने पैसे को बट्टे खाते में डाला है।
बैंक पैसा वसूलने के लिए ट्रिब्यूनल और अदालत का सहारा ले रही है। चिंता की बात है कि साल दर साल राइट ऑफ किए गए ऋण का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है और वसूली की दर कम हो रही है। रिजर्व बैंक के गवर्नर ने पिछले दिनों कहा था कि वसूली की सभी संभावित कोशिश करने के बाद ही ऋण को राइट ऑफ किया जाना चाहिए।
हैरानी की बात ये है कि इतने भारी मात्रा में ऋण राइट ऑफ करने के बाद भी न तो बैंक और न ही आरबीआई ये जानकारी दे रही है कि आखिर ये कौन लोग हैं जिनके इतने ऋण राइट ऑफ किए गए हैं। गौरतलब है कि जब एक ऋण खाते में ब्याज व मूलधन की वसूली नहीं हो पाती, तो सामान्य शब्दों में ऐसे खाते को एनपीए खाता कहा जाता है।
बैंकों के एनपीए का मामला काफी समय से चला आ रहा है, लेकिन इधर इसको लेकर चिंता बढ़ी है। बैंक नियमों के तहत कर्ज की वसूली करने की कोशिश करती है। ज्यादातर मामलों में वसूली हो ही नहीं पाती है या होती है तो न के बराबर। 2020-21 में बैंकों ने करीब 1.76 लाख करोड़ रुपए बट्टे खाते में डाल दिए, जिसमें से सिर्फ 33 हजार करोड़ रुपए की वसूली हो पाई।
हालांकि एनएपी से निपटने के लिए बैंकों के पास पर्याप्त अधिकार हैं, वहीं रिजर्व बैंक के गवर्नर ने भी एनपीए की समस्या से सख्ती से निपटने का आह्वान बार-बार किया है। सवाल यह है कि जब सरकार और रिजर्व बैंक, दोनों इस समस्या को लेकर समान रूप से चिंतित है, तो समाधान क्यों नहीं निकल पा रहा है? एनपीए न सिर्फ बैंकों के लिए बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह है।
इसके चलते बैंकों के पास कारोबारी पूंजी कम हो जाती है, जिससे कई बहुत अच्छे प्रस्तावों के लिए भी कर्ज देने को उनके पास पर्याप्त रकम नहीं होती। यही नहीं, डूबी रकम की भरपाई के लिए वे नए कर्जों पर ब्याज दर बढ़ा सकते हैं, जिसका खमियाजा ग्राहकों को भुगतना पड़ेगा। एनपीए न सिर्फ बैंकों के लिए, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह हैं।
