मुरादाबाद: नाबालिग से दुष्कर्म के दोषी को 20 साल की सजा, पीड़िता के मेडिकल रिपोर्ट में नहीं हुई थी रेप की पुष्टि
मुरादाबाद, अमृत विचार। नाबालिग से दुष्कर्म के छह साल पुराने मामले में मंगलवार को अदालत ने आरोपी युवक को दोषी करार देते हुए 20 साल की सजा सुनाई है। साथ ही उस पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है। हालांकि पीड़िता की मेडिकल रिपोर्ट में दुष्कर्म की पुष्टि नहीं हुई थी। जिसे आधार बनाकर बचाव पक्ष आरोपी को दोषमुक्त करने की दलील दे रहा था।
2016 में मैनाठेर थाना क्षेत्र के एक गांव निवासी ग्रामीण ने पुलिस को तहरीर देकर आरोप लगाया था कि उसकी नाबालिग बेटी शौच के लिए गई थी। तभी आरोपी ने गांव के ही दो अन्य युवकों की मदद से उसे अगवा कर लिया। तहरीर पर पुलिस ने नासिर और उसके दो साथियों के खिलाफ नाबालिग के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज की थी। पॉक्सो एक्ट में मामला दर्ज किया गया। जांच के बाद पुलिस ने मुख्य आरोपी नासिर के खिलाफ अपहरण और दुष्कर्म की धाराओं में कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल किया था।
मामले की सुनवाई विशेष न्यायाधीश पॉक्सो एक्ट चंद्र विजय श्रीनेत की अदालत में हुई। सहायक शासकीय अधिवक्ता मनोज गुप्ता ने अभियोजन पक्ष रखा। सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने आरोपी नासिर को नाबालिग के अपहरण और दुष्कर्म का दोषी माना। फैसले के बाद आरोपी को न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया। एडीजीसी मनोज गुप्ता ने बताया कि अदालत ने दोष सिद्ध करते हुए आईपीसी की धारा-376 में नासिर को 20 साल के कठोर कारावास और 50,000 रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई है। अर्थदंड जमा नहीं करने पर दोषी को छह माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।
वहीं अभियोजन पक्ष एडीजीसी मनोज गुप्ता ने बताया कि मेडिकल रिपोर्ट में दुष्कर्म की पुष्टि नहीं होने पर बचाव पक्ष आरोपी को रिहा करने की दलील दे रहा था। लेकिन न्यायालय ने उत्पल दास बनाम पश्चिम बंगाल राज्य 2010 और राजेश तिवारी बनाम राज्य में हाईकोर्ट दिल्ली के दो फैसलों की नजीर देते हुए बचाव पक्ष की इन दलीलों को खारिज कर दिया। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि यदि पीड़िता के गुप्तांगों में कोई चोट नहीं है तो यह अवधारित नहीं किया जा सकता कि उसके साथ दुष्कर्म नहीं हुआ हो।
एडीसीजी मनोज गुप्ता ने बताया कि अदालत ने अपने फैसले में ओएम बेबी बनाम स्टेट ऑफ केरल 2012 (3) में सर्वोच्च न्यायालय न्यायालय के उस आदेश को भी कोट किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दुष्कर्म के मामले में पीड़िता को कोई चोट या मारपीट के निशान नहीं पाए गए तो यह तथ्य निर्णायक नहीं हैं।
जब तक कि पीड़िता के परिसाक्ष्य में असंगतता या विरोधाभास महत्वपूर्ण न हो, तब तक पीड़िता के परिसाक्ष्य पर अविश्वास नहीं किया जाना चाहिए। पीड़िता की परिसाक्ष्य की विवेचना के दौरान न्यायालय को अपने मस्तिष्क में देश में विद्यमान मूल्यों विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के मूल्यों को ध्यान में रखना चाहिए। यह सामान्य नहीं है कि कोई महिला दुष्कर्म की किसी झूठी कहानी को लेकर न्यायालय आएगी और किसी निर्दोष व्यक्ति को फंसाएगी।
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