उम्मीद भरा समझौता
लंबे समय से दुनिया जैव विविधता संकट का सामना कर रही है। अब समय आ गया है कि जैव विविधता को बचाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं। पिछले दिनों जैव विविधता पर संयुक्त राष्ट्र के कॉप 15 शिखर सम्मेलन में 195 देशों ने 2030 तक ग्रह पर भूमि और पानी के 30 प्रतिशत के संरक्षण के लिए प्रतिबद्धता जताई। इस संकट काल में भारत की पहल पर वैश्विक सहमति महत्वपूर्ण कही जा रही है।
ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों से दुनिया को बचाने के लिए तमाम राष्ट्र सजग-सहमत हुए हैं। इसे समझने की जरुरत है कि सभी जीव एक-दूसरे पर निर्भर और पारिस्थितिकी चक्र में परस्पर गुंथे हुए हैं। ऐसे में यदि भूमि और जल को संरक्षित कर लिया जाए तो बड़े संकटों का सामना करना आसान हो जाएगा।
यह अच्छी बात है कि विकासशील देशों में 2025 तक बीस अरब डॉलर व उसके बाद 2030 तक हर साल तीस अरब डॉलर की वित्तीय मदद की सहमति बनी है। ऐसे हालात में जब पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से मौसम में आए बड़े बदलावों से होने वाली क्षति से जूझ रही है, यह समझौता उम्मीद जगाने वाला है।
दरअसल, अब तक जो विकसित देश जिम्मेदारी से बचने की कोशिश में रहते थे, वे अब क्लाइमेट चेंज के घातक प्रभावों को महसूस करने लगे हैं। देखना होगा कि पर्यावरण सुधारने व कार्बन उत्सर्जन पर नसीहत देने वाले विकसित देश समझौते को लागू करने के लिए कितना आर्थिक योगदान देते हैं। संभव है ग्लोबल वार्मिंग प्रभावों की आंच घर तक पहुंचने के बाद उनका रवैया बदले।
इस बात को भी स्वीकारा गया कि जैव-विविधता संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा की जाएगी। मांट्रियल में संपन्न सम्मेलन में भारत ने कृषि, वानिकी और मछली पकड़ने के क्षेत्रों में उपयोग किए जाने वाले उर्वरकों, ईंधन और अन्य सामग्रियों के लिए सब्सिडी में भारी कटौती के प्रस्ताव का विरोध यह तर्क देते हुए किया कि अपनी आबादी की आजीविका की जरूरतों के साथ पृथ्वी की दीर्घकालिक सुरक्षा को संतुलित करने की आवश्यकता है।
भारत की आलोचना इस बात को रेखांकित करती है कि विभिन्न राष्ट्रों के अलग-अलग प्रिज्म हैं, जिसके माध्यम से वे कॉप 15 को देखते हैं। जैव विविधता को वास्तविक रूप से संरक्षित करने के लिए, यह भी महत्वपूर्ण है कि दुनिया भर की सरकारें स्वदेशी समुदायों को सशक्त बनाएं, जिन्होंने सदियों से जल निकायों, जंगलों और ग्रह को ही संरक्षित किया है।
