Kanpur के जर्जर पुलों के झटके कमर तोड़ रहे, तमाम कयासो के बाद भी नहीं सुधरी स्थिति, अब अगले साल जनता को इंतजार
कानपुर के कई पुल जर्जर हो चुके है।
कानपुर के जर्जर पुलों के झटके कमर तोड़ रहे है। तमाम कयासों के बाद भी पुल की स्थिति सुधरी नहीं है। जनता को अब अगले साल का इंतजार है।
कानपुर, अमृत विचार। सुगम सफर और जाम से बचने के लिए शहर में बनाए गए एक दर्जन पुल आज अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहे हैं। तकनीकी खामी के चलते गोविंदपुरी पुल, पुराना झकरकटी पुल, घंटाघर पुल, दादानगर पुल हो या फिर नरेन्द्र मोहन सेतु इनसे वाहन से गुजरते वक्त आपने तेज झटके महसूस किए होंगे। इन झटकों से मिलने वाला दर्द लाखों लोगों के लिये समस्या बनी हुई है।
एक दो पुलों को छोड़ दें तो नए और पुराने सभी पुलों के स्लैब जोड़ खराब हो गए हैं। डॉक्टरों का कहना है कि बार-बार और लगातार इस तरह के झटके रीढ़ की हड्डी को कमजोर व खराब कर रहे हैं। जिससे कमर दर्द, गर्दन दर्द के अतिरिक्त अन्य गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अमृत विचार की टीम ने जब कानपुर के पुलों का जायजा लिया तो देखा कि शहर के लगभग सभी पुलों का हालत खस्ता हो चुकी है। जिसमें से हम आपको इन तीन पुलों के बारे में विस्तार से बता रहे हैं ।
गोविंद नगर पुल : दक्षिण क्षेत्र को जोड़ने वाले पुराना गोविंदपुरी पुल से आवागमन करते हैं, तो जरा सावधान होकर गुजरें। क्योंकि पुल की रिटेनिंग वॉल कमजोर व कई जगह से टूटी है। पुल के नीचे की स्लैब का कुछ हिस्सा गिर भी चुका है। जिससे सरियों का जाल खुला दिख रहा है। ऐसे में पुल की मरम्मत होना जरूरी है, लेकिन जिम्मेदार इसकी सुध नहीं ले रहे हैं। समानांतर गोविंदपुरी पुल बनने के बाद पुराने पुल को अफसर लगातारअनदेखा कर रहे हैं। पूरे पुल में बाहर की ओर से पेड़ जड़ों से निकले हुए हैं, जो पुल को और खोखला कर रहे हैं। मरम्मत न होने के चलते दीवारों के बीच का प्लास्टर गिर रहा है। जिससे अंदर के बीच की गैपिंग साफ देखी जा सकती है। वर्तमान में पुल पर डाले गए लोहे के गार्डर ऐसे लगाए गए हैं, कि वाहन सवारों को उछल-उछलकर झटको के साथ गुजरना पड़ता है। जिससे वाहन सवारों को कमर, कंधा, गर्दन और सिर दर्द अपने आप शौगात के रूप में मिल रहे हैं।
पुल पर एक नजर : जोड़ता : उत्तर व दक्षिण कब बना -1973 मियाद: 50 वर्ष वाहनों का लोड: दो लाख क्षमता : एक लाख
झकरकटी पुल : जीटी रोड पर स्थित झकरकटी पुल जर्जर होने के साथ-साथ वेंटीलेटर पर अपनी अंतिम सांसे गिन रहा है। पुल के दोनों ओर के फुटपाथ धंसे हुए हैं। सड़क के बीचो बीच निकले गार्डर के कारण वाहन झटके के साथ निकलते हैं, जिससे कमर में खिंचाव आ जाता है। पुल के नीचे की स्थिति बद से बदत्र हालत में है। जगह-जगह सरिया का जाल खुला हुआ है। रिटेनिंग वॉल से ईंटे निकल रही है। बेसमेंट से पुल जर्जर होता चला जा रहा है। लेकिन देखने वाला कोई नहीं है। यहाँ भी वाहन सवारों को समस्याएं मुफ्त मिल रही हैं।
घंटाघर पुल : घंटाघर से टाटमील जाने वाला पुल भी बेहद खस्ताहाल स्थिति में है। पुल पर सैकड़ो गडढे हो गये हैं। पुल की स्लैब में लोग धड़धड़ाते हुए वाहनों को झटके के साथ गुजार रहे हैं। पुल के नीचे सरिया का जाल मुंह खोल रहा है। किनारे पर बनी बाउंड्रीवाल टूटी पड़ी है। बारिश के समय गड्ढों में पानी भर जाने से काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। सालों पहले हुए ब्रिज के निर्माण की साफ तौर पर अनदेखी की जा रही है। मेंटीनेंस न होने के चलते किनारों पर भीषण गंदगी जमी हुई है।
युवाओं में 40 फीसद बढ़ी समस्या
न्यूरो सर्जन डॉ. विकास शुक्ला के मुताबिक युवाओं में उबड़ खाबड़ सड़क, गड्ढे और पुल पर खस्ताहाल ज्वाइंटर से युवाओं में 40 फीसद समस्या का इजाफा हुआ है। उन्हें कमर, साइटिका, गर्दन और कंधे के दर्द की दिक्कत होने लगी है। यही समस्या दोपहिया वाहन सवारों में अधिक है। पीछे बैठी सवारियों में भी यही समस्या होने लगी है। ओपीडी में कई केस आ रहे हैं। चार पहिया चलाने वालों में स्लिप डिस्क की समस्या मिल रही है।
