110 साल की हुई तारिक की ‘महबूबा’, नजाकत बरकरार
लोग आज भी कार देखने के लिए तारिक के स्वरूपनगर स्थित निवास पर आते हैं
महेश शर्मा
अमृत विचार, कानपुर। रोल्स-रॉयस उनका इश्क है। उसकी सर्विसिंग हो या ओवर-हॉलिंग या फिर कोई पुर्जा मंगाना हो तारिक इब्राहिम सीधे लंदन में संपर्क करते हैं। जरूरत पर जाते भी हैं। इंटैक (इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज) कानपुर चैप्टर के लंबे समय तक संयोजक रहे स्वरूपनगर के तारिक इब्राहिम रोल्स-रॉयस 24 जनवरी को 110 साल की हो जाएगी। इस कंपनी की पहली खेप की यह कार तारिक इब्राहिम की पत्नी वासिया इब्राहिम के परनाना हाफिस मोहम्मद हलीम 1928 में लंदन खरीदी थी। कारोबार के सिलसिले में उनका लंदन जाना हुआ करता था। उन्होंने कार को अपने बेटे लंदन में पढ़ाई कर रहे एसएम बशीर को भेंट कर दी। वह 1935 में कानपुर में आए तो कार भी साथ ले आए। रोल्स-रॉयस एंथुजियास्ट क्लब भी जो जानकारियां एकत्र करता है। इसकी मरम्मत और सर्विसिंग के लिए जोनाथन हार्ले कानपुर आया करते थे। तारिक इब्राहिम बताते हैं कि वह कम से कम 15-20 दिन रुकते थे। कोई चार महीने पहले उनका निधन हो गया। कंपनी से 1913 के मॉडल की रोल्स-रॉयस के काबिल मिस्त्री के लिए लंदन संपर्क किया गया है। जरूरत पड़ने पर पुरजे आदि खरीदने तारिक खुद लंदन जाया करते थे।
रोल्स-रॉयस एंथुजियास्ट क्लब से जुड़े हैं लोग
इसकी आज भी लोकप्रियता है जिसका प्रमाण तो यही है कि लंदन में रोल्स-रॉयस एंथुजियास्ट क्लब बना है जो जानकारियां एकत्र करता है। तारिक और उनकी पत्नी वासिया इब्राहिम इसके सदस्य हैं। पुरानी कारों के शौकीन अमेरिका और यूरोपीय देश के लोग आज भी कार देखने के लिए तारिक के स्वरूपनगर स्थित निवास पर आते हैं। 2006 में इसे खरीदने के लिए विदेशी कारोबारी आए थे जिन्होंने उनकी रोल्स-रॉयस कार के बदले किसी मॉडल की नयी रोल्स-रॉयस देने चार करोड़ की पेशकश की थी जिसे ठुकरा दिया गया था। वह कहते हैं कि दुनिया में एक ही पीस है तो उसकी कीमत कोई कैसे लगा सकता है? कहा जाता है कि उनकी सिल्वर घोस्ट लिमोजीन दुनिया में इकलौती कार है। कानपुर के महिला पार्क में 24 जनवरी 2013 को इसका 100वां बर्थडे धूम से मनाया गया जिसमें विदेशी मेहमान भी आए थे।
प्रथम विश्वयुद्ध बख्तरबंद बनीं कारें नष्ट हुई थी
प्रथम विश्वयुद्ध 1914 में शुरू हो गया था। ब्रितानी सेना ने पारशल की कार छोड़कर रोल्स-रॉयस की बाकी 8 सिल्वर घोस्ट लिमोजीन कारें ले लीं थी जिन्हें बख्तरबंद बनाकर युद्ध में इस्तेमाल किया लेकिन ये सभी बख्तरबंद गाड़ियां जर्मनी की सेना के हमले में नष्ट हो गयीं थी। तारिक कहते हैं कि यदि उनके पास 1913 की सिल्वर घोस्ट रोल्स-रॉयस है।
.jpg)
कानपुर के हाफिज मोहम्मद हलीम ने खरीदी थी
तारिक कहते हैं कि यह दुर्लभ कार उनके पास होने का श्रेय पारशल और उनके इंजीनियर होने को जाता है। विश्व युद्ध खत्म होने के एक वर्ष बाद पारशल ने अपनी कार ठेकेदार दोस्त ए.स्टीवार्ट को बेच दी। उसने 1920 में यह कार सर जॉन एंडरसन को बेच दी और 1925 में यही रोल्स-रॉयस कार मेजर जीओ सैंडी तक पहुंची। सन 1928 तारिक इब्राहिम की पत्नी वासिया इब्राहिम के परनाना हाफिज मोहम्मद हलीम ने खरीद ली थी। मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव ने सैफई में आयोजित विंटेज कार रैली में रोल्स-रॉयस में बैठकर सड़कों पर घूमे थे।
महाराजा जय सिंह की नाराजगी महंगी पड़ी
ब्रिटेन की रॉल्स-रॉयस एक लग्ज़री ऑटोमोबिल कंपनी है मालिकाना हक बीएमडब्ल्यू एजी के पास है। रॉल्स-रॉयस की स्थापना चार्ल्स रॉल्स और हेनरी रॉयस ने साल 1904 में की थी। रॉल्स-रॉयस इन्हीं के नाम पर पड़ा था। हमारे देश में भी रॉल्स-रॉयस की कारों की बिक्री होती है। रोचक किस्सा मिलता है कि राजस्थान के अलवर के महाराजा जय सिंह प्रभाकर की नाराजगी इस कंपनी को इतनी महंगी पड़ गयी थी कि मालिकों तक को माफी मांगनी पड़ी थी।
किस्सा कुछ यूं था
ऐसी सामग्री मिलती है कि 1920 के दशक महाराजा जय सिंह प्रभाकर जब लंदन गए थे तो साधारण भारतीय परिधान में शोरूम में रोल्स रॉयस कारें देखी तो कारों के शौकीन महाराजा ने कार खरीदने के लिए शोरूम में जाने की चेष्टा की शोरूम के विक्रय अधिकारी ने समझा कोई साधारण आदमी है। नतीजतन उन्हें घुसने ही नहीं दिया। दि टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक नाराज महाराजा ने रोल्स रॉयस कार डीलरशिप के मैनेजर को बुलाया. उन्होंने उसके सामने अपनी पहचान उजागर की. उन्होंने तब शोरूम में खड़ीं सभी सात कारों को खरीदने का आर्डर दे दिया। उन्होंने ये भी कहा कि इन कारों की डिलिवरी भारत आकर वही सेल्समैन करेगा जिसने उन्हें घुसने से रोका था। कार पहुंचायी गई। महाराजा ने बगैर उस सेल्समैन को ज्यादा तवज्जो दिये अपने सहायकों से कहा कि हर कार को नगर पालिका में कूड़ा इकट्ठा करने के लिए लगा दिया जाए। खबर मीडिया के माध्यम से दुनिया को पता चली तो रोल्स रॉयस के ब्रांड और इमेज को धीरे से जोर का झटका लगा। कंपनी ने तुरंत अलवर में महाराजा के महल में टेलीग्राम के जरिए एक माफीनामा भेजा। तब महाराजा जयसिंह प्रभाकर ने कूड़ा एकत्र करने के काम से सभी रोल्स-रॉयस हटवा ली थी। महाराजा मैसूर के काफिले में कई रोल्स-रॉयस चला करती थी।
ये भी पढ़ें -SC ने ‘एक व्यक्ति, एक कार’ का नियम लागू करने के अनुरोध वाली याचिका की खारिज
