पाकिस्तान को चेतावनी
पाकिस्तान की हठधर्मिता की वजह से सिंधु जल संधि खतरे में पड़ गई है। संधि में आवश्यक संशोधन के लिए भारत ने पाकिस्तान को नोटिस जारी किया है। समझना जरुरी है कि आखिर सिंधु नदी का इतना महत्व क्यों है? सिंधु दुनिया की सबसे बड़ी नदियों में से एक है। इसकी लंबाई 3180 किलोमीटर से अधिक है। इसका उद्गम स्थल तिब्बत के मानसरोवर के निकट सिन-का-बाब नामक जलधारा को माना जाता है। इसके अलावा, सतलज का उद्गम स्थल भी तिब्बत में ही है।
बता दें कि भारत और पाकिस्तान ने 19 सितंबर 1960 को सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर किए थे। इस संधि के अनुसार सतलज, व्यास और रावी का पानी भारत को दिया गया था। वहीं सिंधु, झेलम और चिनाब का पानी पाकिस्तान के हिस्से में गया था।
बड़ी बात यह है कि इस संधि में भारत और पाकिस्तान के अलावा विश्व बैंक भी एक हस्ताक्षरकर्ता था। गौरतलब है कि संधि पर अमल के लिए ही सिंधु आयोग बनाया गया, जिसमें दोनों देशों के जल आयुक्तों को विवाद निपटाने का प्रयास करने के लिए हर साल मिलना तय किया गया। भारत ने हमेशा जिम्मेदार साझीदार के रूप में संधि का पालन करने का प्रयास किया। वहीं पाकिस्तान ने 2017 से 2022 तक स्थायी सिंधु आयोग की पांच बैठकों के दौरान इस मुद्दे पर चर्चा करने से इनकार कर दिया।
सिंधु जल संधि के तहत जिन पूर्वी नदियों के पानी के इस्तेमाल का अधिकार भारत को मिला था, उसका उपयोग करते हुए भारत ने सतलज पर भाखड़ा बांध, व्यास नदी पर पोंग और पंडोह बांध तथा रावी नदी पर रणजीत सागर (थीन) बांध का निर्माण किया। इसके अलावा, भारत ने इन नदियों के पानी के बेहतर इस्तेमाल के लिए व्यास-सतलुज लिंक, इंदिरा गांधी नहर और माधोपुर-व्यास लिंक जैसी अन्य परियोजनाएं भी बनाईं।
इससे भारत को पूर्वी नदियों का करीब 95 प्रतिशत पानी का इस्तेमाल करने में मदद मिली। हालांकि इसके बावजूद रावी नदी का करीब 2 मिलियन एकड़ फीट पानी हर साल बिना इस्तेमाल के पाकिस्तान की ओर चला जाता है। ध्यान रहे भारत को सिंधु रिवर बेसिन में यह फायदा मिलता है कि इन नदियों के उद्गम के पास वाले इलाके भारत में पड़ते हैं। पाकिस्तान हमेशा से संधि के प्रावधानों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के प्रयास करता रहा। भारत की चेतावनी को उसे गंभीरता से लेना चाहिए क्योंकि ये नदियां भारत से पाकिस्तान में जा रही हैं और भारत चाहे तो सिंधु के पानी को रोक सकता है।
