मैं जी भर जिया

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

16 अगस्त: पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भले ही दुनिया को अलविदा कह दिया लेकिन अपने तेजस्वी, ओजस्वी और यशस्वी विचारों-क्रियाकलापों के चलते वह ‘अटल’हैं। अजर-अमर हैं। न केवल सियासत बल्कि शब्दों के भी अलबेले चितेरे थे। राजनीतिक विरोधियों को भी प्रशंसक बना लेने में माहिर वाजपेयी की वाकपटुता की दुनिया कायल रही है। …

16 अगस्त: पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भले ही दुनिया को अलविदा कह दिया लेकिन अपने तेजस्वी, ओजस्वी और यशस्वी विचारों-क्रियाकलापों के चलते वह ‘अटल’हैं। अजर-अमर हैं। न केवल सियासत बल्कि शब्दों के भी अलबेले चितेरे थे। राजनीतिक विरोधियों को भी प्रशंसक बना लेने में माहिर वाजपेयी की वाकपटुता की दुनिया कायल रही है। राजनीतिक कौशल के साथ-साथ कविता का कौशल भी उनमें अद्‌भुत था। एक बार उन्होंने कहा था, “राजनीति के रेगिस्तान में कविता की धारा सूख गई।”

वाजपेयी ने करीब चार दशक तक विपक्ष की राजनीति की लेकिन राजनैतिक विरोधियों पर उन्होंने व्यक्तिगत सियासी हमले कभी नहीं किए। सरकार चलाई तो विपक्षी भी उन पर हमले करने में बेहद सावधान रहे। वाजपेयी की बतौर नेता अर्जित की गई यही पूंजी थी। 1996 में जब 13 दिनों की उनकी सरकार लोकसभा में विश्वास मत साबित नहीं कर पाई तब लोकतंत्र में शुचिता का पाठ पढ़ाते हुए कहा था कि जोड़-तोड़ से सरकार बनाना तो दूर ऐसी सत्ता को वो चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करेंगे। दोबारा चुनाव हुए तो फिर से प्रधानमंत्री बने। उन्होंने विकास और सामाजिक परिवर्तन के कई आयाम स्थापित किए।

अब जब विपक्ष के नेता को श्रेय देना भी सियासत में पाप समझा जाने लगा है तो आश्चर्य होगा जानकर कि वाजपेयी पड़ोसी देशों के साथ मधुर संबंधों के मामले में नेहरू को अपना आदर्श मानते थे। जरूरत पड़ी तो राजीव गांधी की तारीफ की और जरूरत समझी तो अपने चहेते को राजधर्म निभाने की नसीहत दे डाली। बतौर सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ की आलोचना की और जब वह पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने तो शुभकामनाएं दीं, क्यों कि मामला सियासत और दोनों देशों में संबंधों का था। पाकिस्तान में भी उनकी लोकप्रियता ऐसी थी कि वहां के पीएम को कहना पड़ा था कि आप यहां से भी चुनाव जीत सकते हैं। मन से कवि अटल को भावुक मानने वालों को उन्होंने 1998 में परमाणु परीक्षण कर बता दिया कि देश रक्षा के मामले में वह कतई भावुक नहीं हैं। वाजपेयी ने हमेशा ‘दल से बड़ा देश’ के सिद्धांत में विश्वास किया।

13 दिन की सरकार में विश्वासमत के दौरान अपने ओजस्वी भाषण के बाद जब वह यह कहकर सदन से निकले कि ‘ मैं इस्तीफा देने जाता हूं’ तो पूरा सदन स्तब्ध रह गया था। सियासत में उनका कद जिंदगी के प्रति उनकी जिद में झलकता है ..मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं/ लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?/ तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ/ सामने वार कर फिर मुझे आजमा…