बरेली: आंतों की बीमारियों को खत्म कर कुत्तों को तनावमुक्त रखेगा समुद्री शैवाल
आइवीआरआई के वैज्ञानिकों की टीम कर रही है रिसर्च, गायों में दुग्ध उत्पादन भी बढ़ाने के प्रमाण मिले, शोध से वैज्ञानिकों को मिले कई नतीजे
बरेली, अमृत विचार : बैक्टीरिया की वजह से कुत्तों में होने वाली आंत की बीमारियों की समुद्री शैवाल से बने सप्लीमेंट से रोकथाम की जा सकेगी। आईवीआरआई (भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान) के वैज्ञानिक इस पर काम कर रहे हैं।
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अब तक के शोध से साबित हो चुका है कि समुद्री शैवाल कुत्तों में आंत की बीमारियों को रोकने के साथ उनके तनाव के स्तर को भी कम करने में सक्षम है। कुत्तों के साथ गायों पर भी समुद्री शैवाल के प्रभाव का अध्ययन किया जा रहा है। माना जा रहा कि इससे दुग्ध उत्पादन में भी वृद्धि हो सकती है।
समुद्री शैवाल लाभदायक बैक्टीरिया की बहुतायत होती है जो शरीर में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया को मारकर रोक प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। आईवीआरआई के पशु पोषण विभाग के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. असित दास के अनुसार समुद्री शैवाल में कई तरह के एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं जो कुत्तों के कोलोन यानी आंतरिक आंत के आसपास मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया को खत्म कर देते हैं।
इसमें मौजूद तत्वों से कुत्तों के तनाव का स्तर भी नियंत्रित रहता है। समुद्री शैवाल के इन्हीं गुणों की वजह से 2022 में यह रिसर्च प्रोजेक्ट शुरू किया गया था, अब यह अंतिम स्तर पर है।
डॉ. असित दास के मुताबिक सबसे पहले समुद्री शैवाल के गाय और भैंस पर प्रभाव का अध्ययन किया गया। उन्सहें मुद्री शैवाल से बने उत्पाद चारे में मिलाकर दिया गया। इसका गोवंश में आंत की बीमारियों के साथ शारीरिक स्वास्थ्य में भी सकारात्मक प्रभाव देखा गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके नियमित प्रयोग से गायों की दुग्ध उत्पादन की क्षमता भी बढ़ सकती है।
समुद्री शैवाल में स्वास्थ्यवर्धक तत्वों की भरमार: दरअसल समुद्री शैवाल में आयरन, जिंक, मैग्निशियम ,राइबोफ्लेविन, थियामिन, विटामिन ए, विटामिन बी, विटामिन सी विटामिन जैसे कई तत्व होते हैं। प्रोटीन और फाइबर के साथ ओमेगा 3 फैटी एसिड भी पाया जाता है।
इसी कारण यह पशुओं के लिए बेहतर स्वास्थ्यवर्धक साबित हो सकता है। समुद्री शैवाल को च्विइंग गम, कोल्डड्रिंक समेत कई कन्फैक्श्नरी उत्पादों में भी इस्तेमाल किया जाता है। इन पदार्थों में इस्तेमाल के बाद बचा द्रव्य कई और उत्पादों में प्रयोग किया जा सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस प्रोजेक्ट पर आईसीएआर-आईवीआरआई के समन्वय से 2024 तक अध्ययन किया जाएगा।
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