रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण

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Edited By Amrit Vichar
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पिछले दिनों नई विदेश व्यापार नीति की घोषणा की गई  जिसके जरिए सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में रुपये में लेनदेन करने का रास्ता साफ किया है। यानि भारत ऐसे देशों के साथ भारतीय मुद्रा में व्यापार करने को तैयार है जो डॉलर की कमी या मुद्रा की विफलता का सामना कर रहे हैं। इससे रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण को बढ़ावा मिलेगा।

जानकारों के अनुसार जैसे-जैसे रुपये का उपयोग अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अधिक महत्वपूर्ण होता जाएगा, भारतीय अर्थव्यवस्था में मजबूती आएगी और भारत के वैश्विक कद और सम्मान में वृद्धि होगी। दरअसल भारतीय वित्तीय बाज़ार अभी भी विकास की प्रक्रिया में है और इसे वैश्विक वित्तीय बाज़ारों के साथ और अधिक एकीकृत करने की आवश्यकता है।

भारतीय रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण एक प्रक्रिया है जिसमें सीमा पार लेनदेन में स्थानीय मुद्रा का उपयोग बढ़ाना शामिल है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय अर्थव्यवस्था में बढ़ते विश्वास के कारण रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण अपरिहार्य लगता है, जो कि मौजूदा सरकार द्वारा शुरू किए गए सुधारों के कारण संभव हुआ। गौरतलब है भारत और ईरान रुपये में व्यापार निपटाने की संभावनाएं तलाश रहे हैं।

म्यांमार सरकार ने भारत के साथ व्यापार के लिए मुद्रा परिवर्तनीयता शुरू की है। सरकार के वेनेजुएला, संयुक्त अरब अमीरात और जापान के साथ मुद्रा विनिमय समझौते हैं। सरकार कीमती विदेशी मुद्रा को बचाने और रुपये को मजबूत करने के लिए लगभग 23 देशों में इसका दायरा बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है।

सरकार को विशेष रूप से नेपाल, भूटान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों के साथ सीमा-पार व्यापार को अन्य मुद्राओं के बजाय भारतीय रुपए में किए जाने को प्रोत्साहित करना चाहिए। इससे इन देशों में भी भारतीय रुपए की मांग बढ़ेगी। राजनीतिक अस्थिरता, युद्ध और प्रतिबंध जैसे भू-राजनीतिक कारक मुद्रा के अंतर्राष्ट्रीयकरण पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं।

भारत को अन्य देशों के साथ स्थिर संबंध रखने और भू-राजनीतिक संघर्षों से दूरी बनाकर चलने की जरूरत है, क्योंकि ये अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में भारतीय रुपये के उपयोग को प्रभावित कर सकते हैं। जब किसी मुद्रा के अंतर्राष्ट्रीयकरण की बात आती है तो मुद्रास्फीति की दर भी एक महत्वपूर्ण पहलू है।

भारतीय रिज़र्व बैंक मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखने में सफल रहा है, लेकिन निम्न मुद्रास्फीति दर विदेशी निवेशकों के लिए मुद्रा को कम आकर्षक बना सकती है। हालांकि भारतीय रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया में चुनौतियों के समाधान के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में रुपए के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए भारत को और अधिक सक्रिय कदम उठाने की आवश्यकता है।

सरकार को ऐसी नीतियों को लागू करने की आवश्यकता है जो वित्तीय क्षेत्र के विकास का समर्थन करती हैं, बाजार की पारदर्शिता में सुधार लाती हैं और लालफीताशाही को कम करती हैं।