बरेली: शहर के दामन पर लगे गंदगी के दागों ने बिगाड़ा रैकिंग का खेल

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Edited By Amrit Vichar
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विश्वदीपक त्रिपाठी, बरेली। पिछले साल स्वच्छता रैंकिंग में बरेली शहर को 117 वां स्थान मिला था। ऐसे में, साल भर में नगर निगम के सभी जिम्मेदार अफसर टॉप 50 में आने की तैयारी करने में जुट गए थे। धरातल पर काम करने के बजाय वे हवा-हवाई दावे करते रहे और नतीजा सामने हैं- 149 वीं …

विश्वदीपक त्रिपाठी, बरेली। पिछले साल स्वच्छता रैंकिंग में बरेली शहर को 117 वां स्थान मिला था। ऐसे में, साल भर में नगर निगम के सभी जिम्मेदार अफसर टॉप 50 में आने की तैयारी करने में जुट गए थे। धरातल पर काम करने के बजाय वे हवा-हवाई दावे करते रहे और नतीजा सामने हैं- 149 वीं रैंक। जाहिर है कि स्वच्छता सर्वे में शहर साल भर में 32 रैंक पीछे पहुंच गया।

गुरुवार को नतीजे सामने आए तो जिम्मेदार अफसरों को कुछ कहते नहीं सूझा। असल में, जब काम के बजाय सिर्फ बातें की जाने लगें तो नतीजे यही होते हैं। ऐसा ही नगर निगम के जिम्मेदारों ने किया। शहर की पांच से अधिक ऐसी समस्याएं हैं, जिन्होंने रैकिंग में नंबर कम कर दिए। जमीनी हकीकत यह है कि कई खाली जगहों पर बने कूड़ा स्थल स्वच्छता के माथे पर कलंक साबित हो रहे है। सरकारी भूमि हो या किसी की निजी कूड़ा स्थल। गंदगी खुले में फेंकने से शहर की सूरत बिगड़ चुकी है।

सभी वार्डों में डोर टू डोर कूड़ा नहीं उठता
शहर के 80 वार्डों में स्वच्छता सर्वेक्षण में डोर टू डोर कूड़ा उठान करने की योजना धरातल पर वर्षों बाद भी नहीं उतर सकी है। स्वच्छता सर्वे के लिए आने वाली टीम वार्डो में पहुंच कर लोगों से फीडबैक लेती है। शहर में डोर टू डोर कूड़ा उठान पर नजर डाली जाए तो हालत खराब है। सड़कों पर कूड़ा पसरा मिलता है। सफाई को लेकर बड़ी लापरवाही बरती जा रही है। इसके चलते लोगों का फीडबैक अच्छा नहीं गया। इसके साथ ही वार्डों में कूड़ा उठान दोपहर तक किया जा रहा है।

शहर में डोर टू डोर कूड़ा उठाने का कार्य तीन कंपनियां को ठेका दिया गया है। इसमें दिल्ली की कंपनी शहर के 40 वार्डों का कूड़ा कलेक्शन करेगी। 20-20 वार्डों के लिए दो अन्य को जिम्मेदारी दी गई हैं। लेकिन नौ माह का समय बीत जाने के बाद शहर के आधे वार्डों में लोगों के घरों का कूड़ा लेने वाले पहुंचते नहीं है। डोर टु डोर पर साढ़े चार करोड़ का बजट खर्च किया जा रहा है, लेकिन कूड़े का सही प्रबंधन न होने से लोगों के घरों का कूड़ा सड़कों पर फेंका जा रहा है। इस वजह से भी वार्डों में कूड़ा बिखरा पड़ रहा है। इसके साथ ही गीला और सूखा कचरा अलग न होने से नंबर कम मिले हैं।

1.20 करोड़ नाला सफाई में खर्च
शहर की 76 छोटे- बड़े नालों की सफाई पर इस साल 1.20 करोड़ खर्च किए गए हैं। इसके बाद जलनिकासी की व्यवस्था चकाचक न होने से जलभारव की स्थित से लोगों को जूझना पड़ रहा है। नाले का पानी गली-सड़क पर भरने से गंदगी फैल रही है। इससे स्वच्छता सर्वेक्षण में नंबर कम हो गए।

सालिड वेस्ट मैनेजमेंट
शहर से हर रोज निकले वाले 450 मीट्रिक टन कूड़ा के निस्तारण के लिए निगम के पास ठोस उपाय नहीं है। सालिड वेस्ट मैनजमेंट प्लांट अभी स्थापित नहीं हो पाया है। बाकरगंज में कूड़े का पहाड़ खड़ा है। यहां पर लगा प्लांट भी कर्मचारियों की कमी के कारण लगातार नहीं चल रहा है। इस वजह से भी सर्वेक्षण में अंक कम हो गए।

सीवर समस्या
शहर में सीवर की समस्या है। वार्डों के छोटों व बड़े नाला चोक होने के कारण नाला का पानी सड़क पर पसर जा रहा है। मेन होल को ढ़कने की व्यवस्था ठीक नहीं है। लोगों की शिकायतें जनसुनवाई पोर्टल पर पड़ रही हैं। इसके बाद भी निदान नहीं हो पा रहा है। इससे भी रैकिंग गिरने से अंक कटते हैं।

ओडीएफ और सामुदायिक शौचालय
शहर ओडीएफ प्लस की श्रेणी में है। इसके बावजूद भी सामुदायिक शौचालयों का उपयोग नहीं हो पा रहा है। इसका कारण बताया जा रहा है कि सामुदायिक शौचालयों में पानी की व्यवस्था नहीं है। इसके साथ ही निर्माण की भी समस्या है। कुछ जगहों पर सामुदायिक शौचालय निर्माणाधीन है। इसके कारण भी नंबर कम हो गए।

800 सफाई कर्मचारियों की कमी
स्मार्ट सिटी में सफाई के लिए आबादी के हिसाब से करीब 800 सफाई कर्मचारियों की कमी है। इसके चलते सफाई व्यवस्था पर असर पड़ रहा है। नगर निगम के 80 वार्डों में सफाई व्यवस्था के लिए स्थाई कर्मचारियों के साथ संविदा के सफाई कर्मचारियों की संख्या 1900 है। विभागीय सूत्रों की बातों पर गौर करें तो सफाई कर्मचारियों की तैनाती का स्ट्रक्चर काफी पुराना है। आबादी में 10 गुना बढ़ोतरी हो चुकी है। वार्डों की संख्या में इजाफा हुआ है।

पहले जब पद सृजित हुआ था तो पास के गांवों को नगर निगम में शामिल नहीं किया गया था। अब निगम का क्षेत्र भी बढ़ गया है लेकिन सफाई कर्मचारियों की संख्या आबादी के हिसाब नहीं बढ़ी है। अब सवाल पैदा होता है कि शहर को स्वच्छ करने का दांवा करने वाले अफसर कैसे बिना सफाई कर्मचारियों के वार्डों को चकाचक करेंगे। यहां तक कि कई ऐसे वार्ड हैं, जिनकी आबादी 30 हजार तक पहुंच चुकी है, लेकिन सफाई कर्मचारी महज पांच है।

बरेली कैंट ने पाया 39वां स्थान
स्‍वच्‍छता सर्वेक्षण 2020 देश की 62 छावनियों में बरेली कैंट ने 39 वां स्थान हासिल किया है। रैंक में भले ही इस बार चार पायदान का सुधार हुआ हो लेकिन स्कोर 317 बढ़कर 2070 पर पहुंच गया है। वर्ष 2018 में बरेली कैंट 57वें स्थान पर था, 2019 में यह 43वें स्थान पर था। जबकि 2020 में यह 39वें स्थान पर है। मुख्य सफाई निरीक्षक मनोज तिवारी ने बताया कि स्वच्छता सर्वेक्षण के परिणामों में पहले नंबर पर जालंधर कैंट आया है। दूसरे पर दिल्‍ली कैंट है और तीसरे नंबर पर मेरठ कैंट आया है।

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