Chitrakoot: मिसाल-गांव में पानी की किल्लत देख खोद डाला था कुंआ, मिट्टी में मिलती रही मेहनत और चले गए कृष्णा कोल

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

चित्रकूट में मिसाल-गांव में पानी की किल्लत देख कुंआ खोद डाला था।

चित्रकूट में मिसाल-गांव में पानी की किल्लत देख कुंआ खोद डाला था। मिट्टी में मिलती रही मेहनत और कृष्णा कोल चले गए।

चित्रकूट, अमृत विचार। यूं ही नहीं होती हाथ की लकीरों के आगे उंगलियां, रब ने भी किस्मत से पहले मेहनत लिखी है...। बुंदेलखंड के माझी कहे जाने वाले कृष्णा कोल ने कभी इन लाइनों को तो न पढ़ा होगा पर ये लाइनें उनकी जिंदगी का फलसफा जरूर बन गईं। जिस पाठा में पेयजल योजनाओं के नाम पर जाने कितनों की जेबें भर गईं पर कुंओं-तालाबों में पानी नहीं भर पाया, हैंडपंप पानी देने के नाम पर हवा निकालकर हांफते रहे, वहां एक अनपढ़ ग्रामीण की जिजीविषा ने कुंआ खोद दिया, जिसने सालों तक गांववालों की प्यास बुझाई। रविवार को मेहनत की नजीर बन चुके इस शख्स ने अंतिम सांस ली। उनकी लगन को देखकर लोगों ने उनको लोग पाठा का दशरथ माझी भी कहा करते थे। 

तमाम दावों-वादों के बीच मानिकपुर विकास खंड अंतर्गत गढ़चपा गांव पंचायत के मजरे बड़ेहार का पुरवा तक अभी भी विकास की किरणों का उजाला नहीं पहुंचा। इसी मजरे के बाशिंदे थे कृष्णा कोल। गांव में पानी की किल्लत देखकर सरकारी योजनाओं की आस देखने की बजाय कृष्णा के मन में आया कि क्यों नहीं गांव में खुद कुंआ खोदें। पाठा के पठारी इलाके में पानी निकालना साधारण बात नहीं थी।

लोग उनकी इस सोच पर हंसे भी, कुछ ने मना भी किया पर तब लगभग बीस साल के युवा और लगन के पक्के कृष्णा ने फावड़ा उठा लिया। रात दिन एक करके लगभग साठ फीट कुंआ खोद डाला और पानी की धार फूटी तो मानो उनकी मेहनत का पसीना पानी के रूप में बहने लगा। अब तो गांव में पानी के लिए कई सुविधाएं हैं पर दो तीन दशक पहले तक यह कुंआ लोगों की प्यास बुझाने के लिए एकमात्र सहारा बन गया था।

समय के साथ कृष्णा कमजोर होते गए तो उनका भागीरथी प्रयास भी देखरेख के अभाव में पहचान और अस्तित्व खोता गया। परिवारवालों ने भी इसकी कद्र नहीं की। किसी अधिकारी और जनप्रतिनिधि ने मेहनत की इस मिसाल को बचाने की कोशिश नहीं की। मरते दम तक कृष्णा को इस बात की टीस रही कि उनकी मेहनत का सिला मिलना तो दूर, किसी ने उनकी मेहनत को बचाया तक नहीं। 

उत्पीड़न के चलते चले आए थे पुरवा

कृष्णा बताते थे कि 20 साल की उम्र में पतरिया गांव से उत्पीड़न के चलते वह पत्नी के साथ वहां से पांच किमी दूर बड़ेहार का पुरवा आ गए। तब वहां पानी की कोई व्यवस्था नहीं थी। कुएं से पानी की धार निकालने में लगभग छह साल लग गए। पहले जो लोग हंसते थे, उन लोगों ने भी साथ दिया और कुंआ प्यास बुझाने को तैयार हो गया। 

गांधीजी से मिलने के बाद पैदा हुई लगन

एक बातचीत के दौरान कृष्णा ने बताया था कि 12 साल की उम्र में उनकी महात्मा गांधी से मुलाकात हुई थी। इसके बाद उनकी लगन और मेहनत देखकर उनके मन में भी कुछ करने की इच्छा जगी थी।

मेहनत की मिसाल को संजोए प्रशासन

परहित सेवा संस्थान के संस्थापक अनुज हनुमत ने कई बार कृष्णा कोल से मिल चुके हैं। उन्होंने बताया कि कृष्णा के मन में एक टीस थी कि उनकी मेहनत का कोई सिला नहीं मिला। बताया कि तत्कालीन जिलाधिकारी शेषमणि पांडेय ने उनको सम्मानित तो किया पर उनकी धरोहर को संजाने का प्रशासन ने कोई प्रयास नहीं किया। उन्होंने कहा कि पाठा के इस दशरथ मांझी को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब उनके गांव में सभी को मूलभूत सुविधाएं मिलें और ध्वस्त और लुप्त हो रही मेहनत की मिसाल कुंये को संजोया जाए।

संबंधित समाचार