प्रयागराज: पुलिस की तरफ से नामित ना करने पर भी पीड़ित के बयान के आधार पर जारी हो सकता है समन आदेश
प्रयागराज, अमृत विचार। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए कहा कि पुलिस रिपोर्ट के आधार पर अपराध का संज्ञान लेने वाला एक मजिस्ट्रेट किसी भी व्यक्ति को सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दिए बयान के आधार पर भी समन जारी कर सकता है। भले ही ऐसे व्यक्ति को पुलिस रिपोर्ट या प्राथमिकी में आरोपी के रूप में नामजद न किया गया हो।
न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने यह स्पष्ट किया कि किसी अपराध का संज्ञान लेने पर व्यक्तियों को बुलाने से पहले मजिस्ट्रेट को उनके पास उपलब्ध सामग्रियों की जांच करनी होती है, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि पुलिस द्वारा नामजद अपराधियों में वह भी शामिल है। न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अगर मजिस्ट्रेट के सामने ऐसी सामग्री मौजूद है जो अभियुक्तों के अलावा अन्य व्यक्तियों की मिलीभगत को भी अपराधिक कृत्य में संलिप्त दर्शाती है, जिन्हें पुलिस द्वारा नामित नहीं किया गया है। ऐसी स्थिति में मजिस्ट्रेट सीआरपीसी की धारा 190(1)(ब) के तहत अपराध का संज्ञान लेने के साथ-साथ व्यक्ति को समन भेज सकता है। उक्त टिप्पणी न्यायालय ने अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश, पोक्सो एक्ट, इलाहाबाद के आदेश के खिलाफ आसिफ अहमद सिद्धिकी की ओर से सीआरपीसी की धारा 482 के तहत दाखिल याचिका को खारिज करते हुए दी।
दरअसल सिद्धिकी के खिलाफ आईपीसी की विभिन्न धाराओं तथा पोक्सो एक्ट की धारा 5/6 के तहत आरोपों के आधार पर समन जारी किया गया था। याची का तर्क था कि समन न्यायिक विवेक के बिना जारी किया गया है। याची का नाम पीड़िता द्वारा सीआरपीसी की धारा 161 के तहत दर्ज बयान में नहीं लिया गया है। दूसरी ओर सरकारी अधिवक्ता ने बताया कि धारा 164 के तहत दर्ज बयान के साथ-साथ डॉक्टर के सामने दिए गए बयान में भी पीड़िता ने स्वीकार किया है कि याची ने उसका यौन उत्पीड़न किया है। अंत में कोर्ट ने कार्यवाही और समन आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई औचित्य न पाकर याचिका को खारिज कर दिया।
ये भी पढ़ें -पीएम और सीएम के विरुद्ध बोलने वाला देश के खिलाफ बोलता है :संजय निषाद
