कानून कोई गणितीय प्रमेय नहीं, बल्कि व्यावहारिक अनुप्रयोग है : HC
प्रयागराज, अमृत विचार। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि कानून का अनुप्रयोग एक गणितीय प्रमेय नहीं है और इसे केवल सैद्धांतिक स्तर पर लागू नहीं किया जा सकता है। राज्य के लोग प्रजा हैं और अगर कानून के अनुप्रयोग को गणितीय रूप से लागू किया जाता है तो कभी-कभी इसका परिणाम विनाशकारी होता है। उक्त आदेश न्यायमूर्ति राहुल चतुर्वेदी की एकल पीठ ने हसनैन उर्फ मलिक द्वारा धारा 482 के तहत दाखिल अर्जी पर सुनवाई करते हुए दिया।
कोर्ट ने कहा कि जब याची परिवार के मुखिया के रूप में नेतृत्व कर रहा है और वह रोटी कमाने वाला अकेला शख्स है। ऐसी स्थिति में उसके बच्चों को अनाथ अवस्था में डालकर उसे जेल भेज देना क्रूरता है। इन परिस्थितियों में याची,उसकी पत्नी और उनका बच्चा खुशी-खुशी परिवार के सदस्यों के रूप में रह रहे हैं और आवेदक को आत्मसमर्पण करने और मुकदमे का सामना करने के लिए कहने की स्थिति में बच्चे का विश्वास और भविष्य दांव पर होगा। इन परिस्थितियों में याची के विरुद्ध अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश, पॉक्सो अधिनियम, बरेली की अदालत में लंबित उपरोक्त मामले की कार्यवाही को रद्द करने में कोई संकोच नहीं है। हालांकि कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यह आदेश तब प्रभावी और पूर्ण होगा, जब आवेदक अपनी पत्नी के साथ दो महीने के भीतर अपनी शादी का पंजीकरण करवाएगा और उसके बाद उचित आदेश पारित करने के लिए इसकी प्रति संबंधित अदालत में पेश करेगा।
मामले के तथ्यों के अनुसार पीड़िता के पिता नत्थू शाह ने दिनांक 16.6.2019 को एकमात्र नामजद अभियुक्त आवेदक के खिलाफ दिनांक 13.6.2019 को हुई घटना के लिए बरेली के थाना सिरौली में आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई है। आरोप है कि वर्ष 2019 में शाम को याची शिकायतकर्ता की पुत्री को बहला- फुसला कर भगा ले गया है। प्राथमिकी दर्ज होने के बाद पीड़ित लड़की ने रिट दायर कर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। बालिका के बरामद होने के बाद बाल कल्याण समिति, बरेली द्वारा पारित आदेश दिनांक 12.9.2019 के तहत उसे राजकीय महिला शरणालय, बरेली भेज दिया गया। इसके बाद उसके पति ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की, जिसे अंततः पति के पक्ष में स्वीकार कर लिया गया। इसके साथ ही पीड़िता द्वारा दायर शपथ पत्र में कहा गया है कि लड़की की शादी 12.6.2019 को मुस्लिम रीति-रिवाजों के अनुसार हुई है और इस रिश्ते से 23.12.2021 को एक बेटी का जन्म हुआ और अब वे दोनों सुख-शांति से पति-पत्नी के रूप में निवास कर रहे हैं।
लड़की ने न्यायालय के समक्ष स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि प्राथमिकी में लगाए गए आरोप मनगढ़ंत हैं और घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है। अतः न्यायालय ने याचिका स्वीकार करते हुए याची के खिलाफ चल रही संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
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