समलैंगिक जोड़ों की चिंताएं
समलैंगिक जोड़ों की चिंताएं दूर करने के प्रशासनिक उपाय तलाशने के लिए समिति बनाई जाएगी। बुधवार को केंद्र सरकार की ओर से उच्चतम न्यायालय में कहा गया कि कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया जाएगा, जो समलैंगिक शादियों को कानूनी मान्यता देने के मुद्दे को छुए बिना, ऐसे जोड़ों की कुछ चिंताओं को दूर करने के प्रशासनिक उपाय तलाशेगी।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से कहा कि प्रशासनिक उपाय तलाशने के लिए एक से ज्यादा मंत्रालयों के बीच समन्वय की जरूरत पड़ेगी। समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि स्पेशल मैरिज एक्ट की व्याख्या में हल्के बदलाव से यह समस्या हल हो सकती है। केंद्र ने कहा है कि पूरे समाज पर असर डालने वाले इस विषय पर संसद में चर्चा होनी चाहिए। इस पर राज्यों की भी राय ली जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट अपनी तरफ से एक नई वैवाहिक संस्था नहीं बना सकता। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने इस दलील को स्वीकार किया कि समलैंगिक शादी को मान्यता देने से कई तरह की दिक्कतें आएंगी, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि साथ रह रहे जोड़ों को किसी भी तरह की सामाजिक सुरक्षा न होना सही नहीं है। आधुनिक समय में समलैंगिकता को पश्चिमी देशों में स्वीकृत किया जाता हैं। अभी 34 देश ऐसे हैं जहां समलैंगिकों को विवाह करने की अनुमति है।
भारत के कई हिस्सों में भी समलैंगिक रिश्ते और विवाह की खबरें आती रहती हैं। छत्तीसगढ़ में संभवतः पहला समलैंगिक विवाह सरगुजा में ज़िला अस्पताल की नर्स तनूजा चौहान और जया वर्मा ने रचाया था। गौरतलब है कि अधिकांश पश्चिमी देशों में समलैंगिकों को हिंसा और भेदभाव से बचाने के लिए कानून बने हुए हैं। फिर भी अधिकांश देशों में, समलैंगिकों को अभी अधिकार और स्वतंत्रता नहीं है, जितने कि विषमलैंगिकों को।
भारत में भी इन संबंधों को व्यापक समाज द्वारा स्वीकारने और आत्मसात करने की सबसे बड़ी चुनौती है। हालांकि इसके लिए न्यायपीठ ने महत्वपूर्ण बात कही है कि समलैंगिक लोगों को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है और इसे लेकर लोगों को अपनी सोच बदलनी होगी।
दरअसल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर किया था। उसके बाद से समलैंगीक विवाह को कानूनी मान्यता देने की मांग जोर पकड़ती गई। जब तक उन्हें सामाजिक स्वीकृति और समर्थन नहीं मिलता, उनकी चुनौतियां खत्म होने वाली नहीं हैं। आने वाले समय में इन चिंताओं से निबटने की तैयारी सरकार और समाज दोनों को दिखानी होगी।
